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सोमवार, 18 जनवरी 2010

साहित्य सृजन

चाहत है मेरी, मैं भी कुछ आरम्भ करूं साहित्य सृजन।
गीतों कविताओं की माला या कथा-कहानी, आलोचन।
देखा है, सुना, पढ़ा भी है, अनुभव कुल मेरा यही रहा।
दायरा संकुचित पहले-सा साहित्य सृजन का नहीं रहा।
साहित्य नाम पर अब कुछ भी लिख दो, सब चलता-बिकता है।
जिसके लेखन में हो विवाद, बस वही यहाँ पर टिकता है।
लेखन का विषय भले कुछ हो, सादगी न हो बस ध्यान रहे।
भरपूर मसाला हो उसमे, अभिमान और अपमान रहे।
इस बहती गंगा में, मैं भी क्यों हाथ न अपने धोऊंगा?
आदर्श सृजन के चक्कर में क्यों निरा मूर्ख बन रोऊंगा?
दो-चार विवादित रचनाएँ लिखकर चर्चित हो जाऊंगा।
पैसा, रोयल्टी, जग-प्रसिद्धि, कुछ तमगे भी पा जाऊंगा।
कुछ चाटुकारिता के बल पर पत्रिका और अख़बारों में।
कुर्सी कोई मिल जायेगी जब सत्ता के गलियारों में।
वह दिन मेरे साहित्य सृजन का सबसे मीठा फल होगा।
साहित्यकार बनना मेरा वास्तव में तभी सफल होगा।

--- घनश्याम मौर्य

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