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सोमवार, 1 मार्च 2010

गौरैया (Sparrow)



आ जा री प्यारी गौरैया।
कहाँ गयी न्यारी गौरैया?
फुदक-फुदक अंगना में आ जा।
दाने डाल दिए हैं, खा जा।
चिक-चिक चूं आवाज़ लगा जा।
सखियाँ अपनी सभी बुला जा।
खली पड़ा झरोखा आ जा।
सुघड़ घरौंदा आज बना जा।
खेतों में, खलिहानों में तू।
करती फिरती थी चूं चूं चूं ।
दूर-दूर अब नज़र न आती।
गीत हमें अब कहाँ सुनाती?
नहीं बचा कोई ठीह-ठिकाना।
जहाँ हो तेरा आना-जाना।
कहाँ खेत-खलिहान बचे हैं?
आंगन - औ- दालान बचे हैं?
ऊंचे ऊंचे भवन बने हैं।
आँगन नहीं मगर सपने हैं।
सब अपने सपनों को पालें।
क्यूँ कर तुझको दाने डालें?
चाह रहे सब सुख की शैय्या।
आ जा री प्यारी गौरैया।
- घनश्याम मौर्य

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