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आयो कहॉं से घनश्‍याम

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गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

बचपन

ज़मी पे घुटनों रेंगता बचपन।
सीढियां चढ़ता उतरता बचपन।
रसोईघर में बैठ माँ के संग,
गीले आटे से खेलता बचपन।
कभी गमले की गीली मिटटी में,
न जाने क्या है ढूंढता बचपन।
कभी घोडा, कभी गाड़ी तो कभी,
गेंद-बल्ले से खेलता बचपन।
कभी काँधे पे बाप के बैठा,
माँ के आँचल कभी छिपता बचपन।
कभी दीवारों पे आड़ी-तिरछी,
लकीर है उकेरता बचपन।
कोई हरकत न नागवार लगे,
ऐसा प्यारा है ये लगता बचपन।
अपने बेटे को मैंने पाया जब,
लौटकर आया फिर मेरा बचपन।

-घनश्याम मौर्य

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर चित्र खींचा बचपन का.