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आयो कहॉं से घनश्‍याम

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शनिवार, 10 अप्रैल 2010

आज तो दौर है सियासतों का

ये ज़माना नहीं रियासतों का।
आज तो दौर है सियासतों का।
आग भड़काने वाले नारों का,
मजहबी दंगों का, अदावतों का।
कार्पोरेटर से लेकर एम पी तक,
झगडा है मालदार ओहदों का।
खौफ है राह में लुटेरों का,
गली-चौराहों में डर शोहदों का।
फर्जी मुठभेड़ कर दरोगा जी,
खेला करते हैं खेल रिश्वतों का।
कल ही बनी थी आज बैठ गयी,
हाल ये है यहाँ इमारतों का,
दफ्तरों में हैं बोर्डों पे सजी,
कोई मतलब नहीं इबारतों का।
बात राहत कि बहुत दूर रही,
जवाब तक नहीं दरख्वास्तों का।
उम्र कट जाती न्याय मिलने में,
करता है जो भी रुख अदालतों का।

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