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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

हरिऔध: खड़ी बोली हिंदी के प्रथम महाकाव्यकार

देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं।
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं.

ये पंक्तियाँ हिंदी साहित्य के उस 'कर्मवीर' की हैं जिसका आज यानि १५ अप्रैल को जन्मदिवस है। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि आज खड़ी बोली हिंदी के प्रथम महाकाव्यकार श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की १४५वी जयंती है।
हिंदी साहित्य के इस पुरोधा का जन्म १५ अप्रैल, १८६५ को आजमगढ़ का निजामाबाद ग्राम में हुआ था। साहित्यिक माहौल उन्हें घर से ही मिला था। उनके बाबा सुमेर सिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के अभिन्न मित्र थे। अतः घर में आये दिन साहित्यिक गोष्ठियां होती रहती थी। इस वातावरण का असर हरिऔध जी पर पड़ना ही था।

मिडिल पास करने के बाद हरिऔध जी ने अध्यापकी की, फिर कानूनगो भी बने, पर नौकरी रास नहीं आई और इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद वे साहित्य रचना में जुट गए। उन्होंने अपने नाम को ही अवधी में उपनाम बना लिया। अयोध्या यानी 'औध' और सिंह यानि 'हरि' इस प्रकार अपने नाम के साथ हरिऔध जोड़ लिया।

हरिऔध जी ने खड़ी बोली हिंदी के विकास में जो योगदान दिया वह अद्वितीय है। उनके samkaleen मैथिलीशरण गुप्त भी खड़ी बोली हिंदी में काव्य रचना कर रहे थे। यह बात सर्वविदित है की महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सर्वप्रथम खड़ी बोली हिंदी के विकास के लिए प्रयास शुरू किये और साहित्यकारों को खड़ी बोली हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित किया। दुःख की बात है की हरिऔध जी की तुलना में गुप्तजी ही द्ववेदी जी को अधिक प्रिय रहे। इस बात की पुष्टि द्विवेदी जी के साथ हुए दोनों साहित्यकारों के पत्राचार से होती है।
किन्तु इस सबसे हरिऔध जी का साहित्यिक कद कहीं से भी छोटा नहीं पड़ता। उन्होंने हिंदी को खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य 'प्रिय-प्रवास' दिया। परंपरा से हटकर हरिऔध जी ने इसमें राधा-कृष्ण के विश्वप्रेमी रूप को दिखाया। अपनी कृति 'वैदेही वनवास' में उन्होंने राम के शाकी, सौंदर्य और शील का निरूपण किया है। उपरोक्त के अतिरिक्त उन्होंने चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, राज्कलाश, पदम् प्रसून जैसी रचनायें भी लिखी।

हरिऔध जी की रचनायें भव पक्ष की दृष्टि से तो समृद्ध हैं ही, कला पक्ष में भी सबल हैं। 'प्रिय-प्रवास' में कृष्ण वियोग में दुखी राधा के मन की भावना को जिस तरह हरिऔध जी ने व्यक्त किया है वह अभूतपूर्व है। उसमे राधा के वियोग को ही नहीं, उनके विश्वप्रेम को भी दिखाया गया है। जगत कल्याण के लिए कृष्ण से दूर रहकर भी वों उन्हें शुभकामनायें देती हैं।
हरिऔध जी ने सर्वप्रथम संस्कृत के वर्णिक छंदों का प्रयोग अपने काव्य में किया। उदाहरनार्थ-

ककुभ शोभित गोराज बीच से,
निकलते ब्रज-बल्लभ यों लसे।
कदन ज्यों करके निशि-कालिमा,
विलसता नभ में नलिनीश है।

हिंदी, उर्दू, फ़ारसी भाषा पर उनका विशेष अधिकार था। 'चुभते चौपदे' और 'चोखे चौपदे' में उन्होंने आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। कुछ उदाहरण देखिये-

(१)

चाँद जैसा खिल अगर सकता नहीं,
क्यों न तो वह फूल जैसा ही खिले।
क्या छोटी में भलाई है नहीं,
दिल करे छोटा न छोटा दिल मिले।

(२)

क्यों पाले पीस कर किसी को तू,
है बहुत पोलिसी बुरी तेरी।
हम चाहते रहे पटना ही,
पेट तुझसे पटी नहीं मेरी।

हरिऔध जी की अनेक रचनाएँ आज भी लोगों की जुबां पर है। चाहे वह 'कर्मवीर' कविता हो या 'उठो लाल अब आँखें खोलो' सभी अपने आप में बेजोड़ है।

हिंदी साहित्य के 'कर्मवीर' को मेरा शत शत नमन.

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