मेरी बात:


आयो कहॉं से घनश्‍याम

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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

ग़ज़ल

पनाह लेने को दर हों कई तो अच्छा है,
सफ़र के वास्ते बस एक नाव काफी है।
गरम लिहाफ जो होते तो बात ही क्या थी,
फिलहाल अपने लिए एक अलाव काफी है।
मेरे इस जिस्म को तू यूँ लहूलुहान न कर,
जान लेने को दिल पे एक घाव काफी है।
राह में हों कई चक्कर ये बात ठीक नहीं,
मज़े के लिए सिर्फ एक घुमाव काफी है।
चलो चलें ये है इंसानी कौवों की महफ़िल,
जो इतनी देर सुनी कांव-कांव काफी है।
- घनश्याम मौर्य

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