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आयो कहॉं से घनश्‍याम

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बुधवार, 5 मई 2010

क्या हो गया है हमारे न्यायालयों को?

यह हमारा न्यायालयों को क्या होता जा रहा है? अभी कुछ सप्ताह पूर्व सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश महोदय द्वारा राधा-कृष्ण का उदहारण देकर लिव-इन रिलेशनशिप की वकालत करने पर उठा बवाल ठंडा भी नहीं हुआ था कि गुजरात हाई कोर्ट ने हिंदी को राष्ट्र भाषा मानने सम्बन्धी क़ानून पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। मज़े की बात यह कि अपीलकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने पर उसे वापस गुजरात हाई कोर्ट से न्याय मांगने को भेज दिया गया।
अब मुंबई हाई कोर्ट ने एक निर्णय में कहा है कि बधाई या उपहार लेना भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे समय में जब हमारा देश विश्व ke भ्रष्टतम देशों की सूची में नित्य नए पायदान चढ़ता चला जा रहा है, न्यायलय द्वारा ऐसा निर्णय देना परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है।

इसलिए भारत के तमाम न्यायाधीशों से मेरा निवेदन है कि देश की जनता नौकरशाहों और नेताओं से पहले से ही त्रस्त है। उसे अब केवल न्यायपालिका का ही सहारा है। यदि न्यायालय भी गैर-जिम्मेदाराना ढंग से कार्य करेंगे या जनता की भावनाओं को ठेस पहुचाने वाले वक्तव्य देंगे तो बेचारी जनता किस्से फ़रियाद करेगी।

1 टिप्पणी:

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

पता नही जी अभी और क्या क्या होगा अपने देश मे....