मेरी बात:


आयो कहॉं से घनश्‍याम

प्रशंसक

रविवार, 14 नवंबर 2010

हम कितने विकसित हैं?

अभी अभी भारत यात्रा पर आये अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत की तारीफों के पुल क्या बांधे, हम भारतवासी आपे से बाहर हो गए. ओबामा के इस भारत गुणगान के पीछे क्या प्रयोजन था, ये सभी बखूबी जानते हैं, लेकिन अपनी तारीफ़ किसे अच्छी नहीं लगती. और तो और, ओबामा महोदय ने तो भारत को एक विकसित देश का तमगा भी दे डाला और हम ख़ुशी के मरे गुब्बारे की तरह फूल गए. ओबामा की रवानगी के तुरंत बाद जो संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी लक्ष्य पूर्ति सम्बन्धी रिपोर्ट आई है, उसने मानो गुब्बारे में सुई चुभोने का काम किया है. हमारी सारी हवा निकल गयी, हम आसमान से ज़मीन पर आ गिरे जब हमें इस रिपोर्ट के ज़रिये पता लगा कि तमाम लक्ष्यों की प्राप्ति में हमारा प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है और कुछ मामलों में तो हम पाकिस्तान और बंगलादेश से भी पीछे हैं. उदाहरण के लिए, भारत में शिशु मृत्यु दर इन दोनों देशों से अधिक है. निर्धनता, कुपोषण, लैंगिक असंतुलन इत्यादि समस्यों के निराकरण में हमारा प्रदर्शन बहुत खराब रहा है. भारत कितना विकसित देश है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में २८ प्रतिशत बच्चे कुपोषित ही पैदा होते हैं. इन समस्याओं का निराकरण केवल सरकारी आंकड़ों में ही हुआ है, हकीकत की ज़मीन पर नहीं. हमारे पास अनाज सड़ाने को है, भूखों को देने के लिए नहीं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मिड डे मील का अनाज बाजारों में बिक रहा है. स्वास्थ्य सेवाओं का भी बुरा हाल है. गाँव की तो बात छोडिये, शहरों में भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. निजी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हैं कि आम आदमी की पहुँच के बाहर हैं.

अच्छा हो कि हमारे राजनेता अमेरिका की चापलूसी के पीछे छिपे मकसद को समझें और इस गलतफहमी में न रहें कि हम एक विकसित देश का दर्ज़ा पाने लायक हो गए हैं. भले ही ऐसा लगे कि विकसित देश का दर्ज़ा हमसे ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन इस दूरी को को तय करना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है. क्या हमारे नेता इस चुनौती को स्वीकार करने को तैयार हैं?

कोई टिप्पणी नहीं: