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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

खोटी पैदाइश - मार्कस क्लार्क की विचारोत्तेजक कहानी Bad Seed का हिन्दी अनुवाद

कुछ दिन पहले मैंने अपने ब्लॉग पर पोस्ट डाली थी कि मैं जल्दी ही एक अंग्रेजी कहानी जो  मैंने हाल ही में पढ़ी है, उसका हिंदी अनुवाद अपने ब्लॉग पर पोस्ट करूँगा.  यह कहानी आस्‍ट्रेलिया के लेखक मार्कस क्‍लार्क द्वारा लिखी गयी है। यह कहानी मैनें इन्‍टरनेट पर पढ़ी थी। यह वाकई दिल को दहला देने वाली कहानी है. इसलिए मैनें सोचा कि इस कहानी का हिन्‍दी अनुवाद आप सब तक पहुँचाया जाये। मैं कोई पेशेवर अनुवादक नहीं हूँ. मैं मूल भाषा में लिखी गयी कहानी की आत्मा को कहाँ तक हिंदी में उतार पाया हूँ,यह तो आप सुधी पाठकगण ही बता सकेंगे। 

कहानी इस प्रकार है-


 सम्पादक,

आस्टन मासिक पत्रिका
१८ जून, १९८९

महोदय,

मेरा नाम कार्ल रोचेस्टर है और मैं एक ऐसे मामले में आपकी सहायता चाहता हूँ जो आपको कुछ अजीब लग सकता है। मैं आपकी पत्रिका में एक पत्र प्रकाशित करवाना चाहता हूँ । यह पत्र हाल ही में मुझे अपने घर की कोठरी में रखी बाइबिल की किताब में मिला जहॉं यह पिछले ५० वर्षों से पड़ा हुआ था। मैं इस पत्र की फोटोकापी साथ में भेज रहा हूँ । इस पत्र को देखकर आप मामले की गम्भीरता को खुद ही समझ जाएंगे। यह मेरे और मेरे परिवार के लिए शर्मनाक है लेकिन इतने वर्षों तक जो सच्चाई दबी रही उसे अब बाहर आना ही चाहिए। पत्र इस प्रकार है:-

यह जिससे भी सम्बन्धित हो

४ फरवरी, १८९८
रेंजविले, विक्टोरिया

मैं, गार्डन रोचेस्टर, अपनी मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ हूँ  और यह कबूलनामा लिख रहा हूँ । मेरा दिमागी संतुलन एकदम ठीक है। हॉलॉंकि कुछ लोगों को लग सकता है कि एक पागल ही इतने सालों तक सजा से बचने के बाद अपने जुर्म का कबूलनामा लिख सकता है। लेकिन मैं इतना बड़ा बोझ लेकर मरना नहीं चाहता। चूँकि यह मरने से तुरन्त पहले किया गया कबूलनामा है, इसलिए मैं जानता हूँ  कि आप इस पर विश्‍वास करेंगे हालॉंकि यह बहुत ही खौफनाक है।

इस अपराध का बोझ पिछले ३६ वर्षों से अपने मन पर लादे हुए मैं जीता रहा हूँ  और मैनें आज तक किसी को नहीं बताया। इसलिये मैं ई’वर की शपथ लेकर सच्चाई बयान करने जा रहा हूँ । कृपया ध्यान से सुनिये।

१७ मई, १८६२ की शाम को मैं, मेलबोर्न में एक पब में शराब पीने गया था। वह पब अब नहीं है। पब से निकलकर मैं सड़कों पर टहलने लगा। मेरे पास एक पाई भी नहीं थी न ही कोई रोजगार था। सर्दी की ठिठुरन भरी रात में खाने और आसरे की तलाश में भटक रहा था।
मैं ला ट्रोब स्ट्रीट पर चला जा रहा था, अपने भाग्य और भगवान दोनों को कोसते हुए जिन्होंने मात्र २३ वर्षीय एक नौजवान को ऐसी परिस्थितियों में ला खड़ा किया था जहॉं न उसका कोई घर था, न रोजागार, न बीवी, न बच्चे और न कोई दोस्त। मैं इस आशा के साथ मेलबोर्न शहर आया था कि एक दिन मेरे हालात बेहतर होंगे, ढंग का काम मिलेगा और एक दिन शायद मेरा अपना एक छोटा सा फार्म भी होगा।
तभी मैनें एक अमीर आदमी को देखा जो हल्के नशे में था। ऐसी महंगी वेशभूषा वाले किसी व्यक्ति को मैनें इससे पहले कभी नहीं देखा था। मैनें उसका पीछा किया। अंधेरी गली में उसका पीछा करते हुए मैनें सोचा कि उस अमीर आदमी की जेब में बहुत सा धन होगा और वह रात में अपने आली’ाान घर में जाकर अपने बीवी-बच्चों के साथ गरमा गरम लजीज खाने का मजा लेगा। जबकि उसके विपरीत मैं एक फटेहाल आदमी था। मैनें उसे लूटने की योजना बनाई। मैनें सोचा कि थोड़ा सा धन लुटने पर उसका कोई नुकसान नहीं होगा, जबकि मेरे पास कुछ भी नहीं था।
धीरे-धीरे उसके करीब पहुँचकर मैनें पीछे से उसे दबोच लिया। मैनें उसे जमीन पर गिरा दिया, यह सोच कर कि वह डर के मारे चुपचाप पड़ा रहेगा। लेकिन उसे मेरा डटकर मुकाबला किया और शोर मचाने लगा। मैनें घबराहट में अपनी लात से उस पर जोरदार प्रहार किया। मैं उसे तब तक मारता गया जब तक वह मर नहीं गया। वास्तव में मैनें उस आदमी की हत्या कर दी थी।
जब मैनें अपने आप पर काबू पाया और देखा कि मैनें क्या कर डाला है, तो मैं भयभीत हो गया। मेरी योजना केवल उसे लूटने की थी लेकिन अब तो वह मर चुका था। मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उसकी जेबें टटोल कर देखूँ। एक मृत व्यक्ति को छूना मैं वैसे भी अपशकुन समझता था। लेकिन उसकी सोने की कलाई घड़ी छिटक कर फुटपाथ पर जा गिरी थी। मैनें उसे उठाया और वहॉं से भाग निकला। लेकिन भागते हुए मुझे अपने आप पर गुस्सा आया कि केवल एक घड़ी के लिए मैनें उस आदमी की हत्या की थी! मैं धड़ी को खाकर अपनी भूख नहीं मिटा सकता था, न ही उसे कहीं बेच सकता था क्योंकि इस घड़ी की वजह से मेरा संबंध हत्या से जुड़ सकता था।
देर रात मैं एक किसान के साथ हो लिया जो अपनी गाड़ी से जीलांग जा रहा था। उसने मुझ पर दया दिखाते हुए मुझे अपने भोजन से कुछ हिस्सा दिया। उसने मुझे एक आदमी के बारे में बताया जिसे अपने फार्म पर बाड़ लगाने के लिए मजदूर की जरूरत थी। अगले दिन मैं भूखा और थका हारा फार्म पर काम में लग गया।
एक हफ्ते बाद मैनें हत्या के बारे में सुना। मैनें अखबारों में पढ़ा कि जिम हैमिल्टन नाम के एक व्यक्ति को हत्या के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया है। वह मेरी तरह ही एक मामूली आदमी था जिसका एक छोटा सा खेत था, पत्नी और बच्चे थे। उसका मुदमा अगले हफ्ते होना था।
निश्चय ही मुझे जिम के लिए अफसोस हुआ पर मुझे ज्यादा चिन्ता नहीं हुई क्योंकि मैं जानता था कि वह निर्दोष है और अदालत को उसे छोड़ना ही पड़ेगा। क्योंकि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं होगा। मैं स्वयं आगे बढकर अपना जुर्म कुबूलने वाला नहीं था। और अब तो मुझे ठीक ठाक नौकरी और रहने की जगह भी मिल गयी थी। जो जिन्दगी दुबारा नए सिरे से शुरू हो रही थी उसे इस तरह एक झटके में बरबाद करना मेरे लिए शर्मनाक होता।
मुझे उस अमीर आदमी की हत्या के लिए अफसोस था। लेकिन अब न तो मैं और न कोई और उसे वापस जीवित कर सकता था। इसलिए मैनें अपना मुँह बन्द रखा और मुकदमे को सुनता रहा।
जिम हैमिल्टन ने अदालत को बताया कि वह देर रात ला ट्रोब स्ट्रीट पर जा रहा था। उसने फुटपाथ पर सोने की घड़ी पड़ी हुई देखी और उठा ली। आगे कुछ दूर चलने पर उसे एक आदमी पड़ा हुआ दिखाई दिया। वह नीचे उस आदमी की मदद करने करने के इरादे से झुका, यह देखने के लिए कि वह जिन्दा है कि नहीं। लेकिन वह आदमी बहुत भारी था। इसलिए मदद के लिए जिम ने आवाज लगायी "प्लीज हेल्प"। पड़ोसी दौड़ते हुए आए और उन्होंने एक अजनबी को मि० गारनेट (मृतक) के साथ लिपटे हुए देखा। उन्होंने उसे पकड़ लिया। वह खुद को एक अपराधी की भॉंति छुड़ाने की पुरजोर कोशिश करने लगा। जब कान्स्टेबल आये तो उन्होंने जिम हैमिल्टन की तलाशी ली और सोने की घड़ी बरामद की। उन्होंने उसे गिरफ्तार कर हत्या का अभियोग लगा दिया।
अदालत ने जिम हैमिल्टन को हत्यारा मानते हुए मृत्युदण्ड दे दिया।
जब मैनें यह खबर सुनी तो यह दिलासा देकर खुद को समझाने का प्रयास किया कि जिम को निर्दोष साबित करना मेरा काम नहीं है। जिम को सजा अदालत ने दी है, मैनें नहीं। लेकिन मैं ज्यादा देर तक अपने अन्दर के डर को नहीं दबा सका कि मेरे अपराध की सजा एक निर्दोष आदमी को मिली है। मैनें तय किया कि मैं गवाही दूँगा कि मैनें एक गैंग को मि० गारनेट की हत्या करते हुए देखा था। मैं मेलबोर्न पुलिस से मिलने चल पड़ा। जब मैं फूट्सफ्राई पहुँचा तो खबर सुनी कि जिम हैमिल्टन को उसी दिन सुबह फॉंसी दे दी गई थी। मैं वापस मुड़ा और घर लौट गया।
इस वाकये को ३६ वर्ष हो गये, मैनें किसी को नहीं बताया। सच्चाई केवल मैं जानता था या भगवान। अब से कुछ ही घंटों या दिनों में ही मैं भगवान के पास जाने वाला हूँ । मैं चाहता हूँ  कि लोग यह जानें, खास तौर से जिम हैमिल्टन के परिवारजन, कि वह निर्दोष था। हत्यारा मैं हूँ ।

ईश्‍वर की शपथ लेकर मैनें यह सब बयान किया।
गार्डन राचेस्टर
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मेरे पड़दादा के इस कबूलनामे को पढ़कर आप मानेंगे कि यह पत्र प्रकाशित होना ही चाहिए। मैं जिम हैमिल्टन के वंशजों को ढूँढकर इस अन्याय के प्रायश्चित के लिए जो भी किया जा सकता है, करना चाहता हूँ । कृपया इस पत्र को प्रकाशित करें ताकि मैं जिम हैमिल्टन के वंशजों से सम्पर्क कर सकूँ।

कार्ल रॉचेस्टर
५५, मेल्वन एवेन्यू
काल्डिंगटिन, एस.ए.
--०--


आस्टन मासिक पत्रिका
२ जुलाई १९८९

प्रिय कार्ल रॉचेस्टर,

आपके द्वारा भेजा गया पत्र पढ़ने में बहुत रोचक लगा। लेकिन मैं इस पत्र को इसके मूल रूप में प्रकाशित नहीं कर सकता। मैं यह कैसे विश्‍वास कर लूँ कि यह कहानी सच है? हो सकता है यह पत्र खुद आपने लिखा हो। किसी सबूत के बगैर मैं इस पत्र को प्रकाशित करने का विचार भी नहीं कर सकता। यदि सबूत हो भी, तो भी अन्य बातों पर भी विचार करने की जरूरत होगी।

भवदीय

जैक कूम्बस
सम्पादक
--०--



१४ सितम्बर, १९८९

सम्पादक
स्टन मासिक पत्रिका


प्रिय श्री जैक कूम्बस

आप समझ ही रहे होंगे कि पिछले कुछ महीने मैं काफी व्यस्त रहा। अपने भेजे हुए पत्र के समर्थन में सबूत जुटाने के लिए मुझे सैकड़ों पुराने दस्तावेज और अखबारों को खंगालना पड़ा। ये सबूत आपके सामने प्रस्तुत हैं-

१. मैनें असल कबूलनामे को पत्र के साथ नत्थी कर दिया है। आप इसकी वैज्ञानिक जॉंच करवाकर इसके पुराने होने का सबूत जुटा सकते हैं।
२. मि० गारनेट की हत्या और जिम हैमिल्टन के अभियोग की खबर वाली अखबार की कतरन भी संलग्न है। इसमें जिम की पत्नी और बच्चों का जिक्र है। इसका मतलब उसके वंशज भी होने चाहिए।
३. अखबार में छपी जिम की फॉंसी की खबर को भी आप देख सकते हैं। यदि आप असल कबूलनामे की जॉंच करें तो पायेंगे कि यह कितना पुराना कागज है, इसकी स्याही, लिखने का तरीका, इन सब बातों से इसके असली होने का पता चलता है। लेकिन कृपया इसकी जॉंच अव’य करवायें। अगर ऐसा सबूत मिलता है कि यह जालसाजी है तो मुझे बेहद खुशी होगी, क्योंकि इस बदनामी का संबंध मेरे परिवार से है।

भवदीय

कार्ल रॉचेस्टर
५५, मेल्वर एवेन्यू
--०--


आस्टन मासिक पत्रिका
२९ सितम्बर, १९८९

प्रिय कार्ल रॉचेस्टर,

आपके हाल ही में भेजे गये पत्र ने मेरा काफी ध्यान आकर्षित किया है। लगता है कि हमें ऐसे सबूत मिल सकते हैं कि हम आपके पड़दादा के इस कबूलनामे को प्रकाशित कर सकें। अगली कार्यवाही के तौर पर मैं एक पत्रकार को जीलांग जनपद भेज रहा हूँ  जो उस जगह के बारे में पता लगायेगा जहॉ आपके पूर्वज ने अपना जीवन गुजारा था। मैं चाहता हूँ  कि पत्रकार जरूरी जॉंच पड़ताल करके गार्डन रॉचेस्टर की पृष्ठभूमि के बारे में और पता लगाये। इस मामले में उम्मीद की किरण नजर आ रही है और हम सम्भवत: एक दो महीनों में ही इस कबूलनामे को प्रकाशित कर सकेंगे।

भवदीय

जैक कूम्बस
सम्पादक

--०--



४ नवम्बर, १९८९
सम्पादक
आस्टन मासिक पत्रिका


प्रिय श्री जैक कूम्बस,

पिछले करीब दो महीनों से आपसे कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई। आपके उस खोजी पत्रकार का क्या हुआ? क्या आप इस मामले को प्रकाशित करेंगे? यह एक गम्भीर मामला है और इससे कई लोगों की जिन्दगी जुडी हुई है। मैं चाहूँगा कि आप इस पर तुरन्त ध्यान दें।

भवदीय

कार्ल रॉचेस्टर
५५, मेल्वर एवेन्यू

--०--

आस्टन मासिक पत्रिका
१५ नवम्बर, १९८९

प्रिय कार्ल रॉचेस्टर,

आपको लिखने में देरी हुई, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ । मैं इधर काफी व्यस्त रहा और आपके मामले के लिए बिल्कुल समय नहीं निकाल सका।
हमारा पत्रकार जीलांग जनपद के निकट रेंजविले गया था और गार्डन रॉचेस्टर की जिन्दगी के बारे में पूरी जानकारी की। उसने पाया कि आपके द्वारा दिये गये सारे सबूत सही हैं। लेकिन हमें बेहद अफसोस है कि हम इसे प्रकाशित नहीं कर सकते।
गार्डन रॉचेस्टर एक मेहनती आदमी था। अपनी मृत्यु पर उसने सब कुछ शहर के नाम दान कर दिया था। वास्तव में उसकी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा स्कॉलरशिप और खिलाड़ियों के लिए बनाये गये ट्रस्ट में इस्तेमाल हो रहा है। उनकी जागीर से हर साल १० स्थानीय विद्यार्थियों को वि’वविद्यालय शुल्क प्रदान किया जाता है। ’रॉचेस्टर’ नाम टाउन हॉल, स्कूल आWफ आट्र्स पर अंकित है और मुख्य सड़क का नाम राचेस्टर एवेन्यू है। शहर के तमाम पार्क, स्मारक आदि के नाम उनके नाम पर हैं। श्री रॉचेस्टर स्वयं और उनके वं’ाज भी काफी उदार थे। हालांकि अब उस शहर में रॉचेस्टर खानदान का कोई व्यक्ति नहीं है लेकिन जैसा आप जान गये होंगे कि रॉचेस्टर नाम उस शहर के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा है और इसकी साख में धब्बा लगाना एक अधार्मिक कृत्य के रूप में देखा जायेगा। नगर परिषद ने कहा है कि अगर हमने यह कबूलनामा प्रकाशित किया तो वे हम पर मुकदमा कर देंगे।
इसलिए हमने इस मामले में कानूनी परामर्श लिया और सलाहकारों ने हमें इसे न छापने की सलाह दी। मुझे अफसोस के साथ आपको यह दु:खद समाचार देना पड़ रहा है। यह हत्या और उसकी सजा में दी गई फॉसी अब पुरानी घटनाएं हो चुकी हैं। गड़े हुए मुर्दे उखाड़ने से कोई लाभ नहीं है। इसलिए इसे भूल जाना ही बेहतर होगा।

भवदीय

जैक कूम्बस
सम्पादक

--०--

२१, सेन्ट रैक्सिन
रेंजविले, विक्टोरिया
२ दिसम्बर, १९८९


प्रिय रिवरेण्ड केपल,

मेरा नाम कार्ल रॉचेस्टर है और मैं जिम हैमिल्टन के वंशजों को ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ। श्रीमती लारेन्स ने बताया कि आपके दादा की उस परिवार से वर्षों तक जान-पहचान थी।

क्या आप उस परिवार के बारे में बता सकते हैं, खासकर कि यह कि मैं उनसे कैसे मिल सकता हूँ ।

भवदीय
कार्ल रॉचेस्टर
--०--


१४ जनवरी, १९९०

प्रिय कार्ल रॉचेस्टर,

मेरे दादा और पिता करीब ९० सालों तक इस जिले में पादरी रहे। जिस हैमिल्टन परिवार का जिक्र आपने किया है, वह मेरे दादाजी और पिता जी से परिचित था हालॉंकि चर्च में उपस्थिति के मामले में नहीं। मैनें अपने दादाजी की उस समय की डायरियां देखी हैं जब वह पादरी हुआ करते थे। यह कहानी बहुत दुखद है। शायद आप जानते होंगे कि जिम हैमिल्टन को मि० गारनेट की हत्या करने के लिए फांसी दी गई थी। उसके बच्चे अपराध और घृणा के माहौल में ही बड़े हुए। उन दिनों लोग बहुत रूढ़िवादी प्रवृत्ति के हुआ करते थे और उनका वि’वास था कि वे पॉंचों बच्चे गन्दे खून की पैदाइश थे और उनके पिता के पाप का असर उन पर भी पड़ेगा। यहॉं तक कि आने वाली पीढ़ियों पर भी। उनके पिता के अपराध के कारण उन बच्चों को भी अपराधी समझकर अविश्‍वास की दृष्टि से देखा जाता था। जब वे बच्चे वयस्क हुए- वे शहरवासियों के अनुमान के अनुरूप ही छिटपुट अपराध, शराब के नशे और हिंसा में संलिप्त हो गये। बीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते वे सब जेल पहुँच गये। दोनों लड़कियॉं शहर के कई लोगों द्वारा यौन शोषण का शिकार होती रहीं और उनकी कई अवैध सन्तानें भी जन्मीं। दोनों लड़कियां अंतत: वेश्‍यावृत्ति में संलिप्त हो गयीं, और उनके बच्चे अपराध, गंदगी और नशे के माहौल में पलने लगे। नगरवासी उनका मजाक उड़ाकर कहते थे, "ये देखो, गन्दे खून की पैदाइश। इनकी मॉं वेश्‍या हैं और दादा एक वहशी हत्यारा जिसको फॉंसी हो गयी।"  अन्त में सारा परिवार बिखर गया, उनकी आनुवंशिक पहचान वैसे ही गायब हो गयी जैसे उनके पिताओं की पहचान। उस परिवार के बारे में जो आखिरी समाचार मालूम हो सका, वह सन १९३२ में एक स्थानीय अखबार में छपी एक छोटी सी खबर थी।

हत्यारों का परिवार

’कुख्यात हत्यारे जिम हैमिल्टन का आखिरी ज्ञात रि’तेदार गैरी हैमिल्टन (४३ वर्ष) अपनी कोठरी में मृत पाया गया। पुलिस सार्जेन्ट जडसन ने संवाददाता को बताया कि बीयर की बोतल को लेकर मारपीट और हत्या करने का आरोप गैरी पर लगाया गया था। हैमिल्टन परिवार कई बरसों से शहर में रह रहा है और ये सभी हिंसक अपराधी और हत्यारों के रूप में कुख्यात थे।’

एक स्थानीय किसान की टिप्पणी थी: "हैमिल्टन का पूरा खानदान ही बुरा था। वे सब एक हत्यारे के वंशज थे, पाप के माहौल में बड़े हुए और अपराधी बन गये। ’ाहरवासी उनसे दूर ही रहते थे। मुझे नहीं लगता कि कोई भी अंतिम संस्कार में उपस्थित होगा।"

--०--


२५ जनवरी, १९९०

प्रिय जैक कूम्बस
सम्पादक

आस्टन मासिक पत्रिका

 क्या आप कृपया कबूलनामे को छापने के बारे में दुबारा विचार नहीं कर सकते। या एक छोटी सी खबर नहीं छाप सकते। मैं जो कुछ हुआ उसे सुधारना चाहता हूँ , केवल अपने परिवार के लिए नहीं, हम सबके लिए। मैं जानता हूँ  कि जो भी अन्याय, पूर्वाग्रह और घृणा के कारण क्षति हुई है, उसकी भरपाई करना असम्भव है। फिर भी मैं खास तौर पर जिम हैमिल्टन के वंशजों से, वे जहॉं कहीं भी हों, मिलना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ  कि कोई इस घटना को किसी बड़ी पत्रिका में प्रकाशित करे।

मैं जिम हैमिल्टन के जो भी जीवित वंशज हैं उन्हें बताना चाहता हूँ  कि उन्हें अपने पिता की बुराई विरासत में नहीं मिली थी, वे अपराध और घृणा से घिरे हुए नहीं हैं। मैं हरेक को बताना चाहता हूँ  कि आपको अपने अतीत को चुपचाप स्वीकार कर लेने की जरूरत नहीं है। क्योंकि हमारे परिवार की जड़ में भी बुराई थी, लेकिन चूँकि कोई भी इस सच्चाई को जान नहीं सका, रॉचेस्टर्स उदार और दानी नागरिक बन गये।

अब मैं एक बात स्पष्ट रूप से समझ गया हूँ  कि हम अक्सर वही बन जाते हैं जो लोग हमसे बनने की अपेक्षा रखते हैं। हमारे वि’वास, भले ही कितने गलत हों, वे हमारी स्वतन्त्र इच्छा को प्रभावित करते हैं।


कार्ल रॉचेस्टर
--०--

समाचारपत्र की खबर

’मेलबोर्न, २ फरवरी। आस्टन मासिक पत्रिका के सम्पादक जैक कूम्बस की उनके दफ्तर के बाहर गम्भीर रूप से पिटाई की गई। उन्होंने पुलिस को बताया कि हमलावर का नाम कार्ल रॉचेस्टर था जो अपने कुछ दस्तावेजों को उनकी पत्रिका में छापने की जिद पर अड़ा था और मना करने पर उग्र हो गया था।’

’देर रात में पुलिस ने कार्ल राचेस्टर को गिरफ्तार कर लिया और अस्पताल में जैक कूम्बस की मृत्यु होने पर, कार्ल रॉचेस्टर पर उसकी हत्या का अभियोग लगा दिया।’

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

मुझे आपकी कहानी और विचारो का संग्रह अच्छा लगता हैं म चाहता हु की आप मेरी कहानी और आर्टिकल छापने का कस्ट करे
धन्यवाद
समाज सेवी पलाश जैन