मेरी बात:


आयो कहॉं से घनश्‍याम

प्रशंसक

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

तेरा-मेरा रिश्ता बहुत पुराना लगता है।

 -1-

तेरा-मेरा रिश्ता  बहुत पुराना लगता है।
फिर भी हर पल ताज़ा  ये याराना लगता है।

 
ऐसे बेपर्दा होकर तुम निकला करो न घर से,
कैसी-कैसी नजरों से ये ज़माना तकता है।

शाम सुहानी अपने यारों संग बितानी हो तो,
सबसे अच्छी जगह मुझे मयखाना लगता है।

ऐरे-गैरे को घर में नौकर रखने से पहले,
जात  तो उसकी पूछो, कौन घराना लगता है?

हम शहरों में रहकर चाहें गॉंवों की हरियाली,
गॉंव के बाशिंदों  को शहर सुहाना लगता है।

दिल हो ग़म  से बोझल, तनहाई में छलके प्याला,
तब जाकर होंठों पर एक तराना जगता है।


-2-


देह मे जब तक भटकती सांस है.
त्रास के होते हुए भी आस है.
दर्द कितना भी भयानक हो मगर,
मुस्कुराने का हमे अभ्यास है.
पी रहा कोई सुधा कोई गरल,
किंतु अपने पास केवल प्यास है.
रास्ते मे आयेंगे तूफान जो,
हो रहा उनका हमे आभास है.
राज्सत्ता हो मुबारक आपको,
भाग्य मे अपने लिखा वन वास है.

कोई टिप्पणी नहीं: