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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

वंचित लोगों को पहले मिले न्याय

हाल में महाराष्‍ट्र की लावासा परियोजना तथा जैतापुर में बिजली संयंत्र लगाने की परियोजना को लेकर जो हो हल्‍ला मचा है, उसमें कुछ भी आश्‍चर्यजनक नहीं हैा अब तो यह आम बात हो गई हैा देश के विभिन्‍न इलाकों में बडी बडी परियोजनाओं, आवासीय कालोनियों इत्‍यादि को कार्यरूप देने के लिए गरीबों के आशियाने उजाड़े जा रहे हैं, उनकी रोजी रोटी छीनी जा रही हैा जब इस बात को लेकर शोर मचता है, तो उन्‍हें झूठे आश्‍वासन देकर मामले की लीपापोती कर दी जाती है, किन्‍तु समय बीतने के साथ ही उन गरीबों की सुध लेने वाला कोई नहीं रहताा जिस अन्तिम आदमी का हितैषी होने का दम्‍भ राजनेता भरते हैं,  उस तक कोई सुविधा पहुँचती ही नहींा होना यह चाहिए कि हर सुविधा की शुरुआत सबसे पहले सबसे  वंचित आदमी से की जानी चाहिएा जिस दिन हमारे नेताओं को यह बात समझ में आ जायेगी उसी दिन गॉंधीजी का अन्‍त्‍योदय का सपना सच होता दिखाई देगाा

इस संदर्भ में मुझे एक कहानी याद आ रही है जो मैनें स्कूल के  दिनों में एक कहानी की किताब में पढी थी. एक बार एक राजा ने अपने राज्य में एक नया आलीशान महल बनवाया. वह महल इतना सुन्दर था कि दूर दूर के राज्यों से बड़े बड़े राजा और साधारण जन भी उस महल को देखने आते और उसकी सुन्दरता की प्रशंसा किये बिना नहीं रहते. किन्तु उसी महल के पास में एक झोपड़ी थी जिसमें एक गरीब बूढ़ा रहता था. राजा का प्रधानमन्त्री जो चाटुकार किस्म का था, उस झोपड़ी को देखकर कुढ़ा करता था क्योंकि झोपड़ी महल की शान को खराब करती थी. उसने उस झोपड़ी को वहॉं से हटवाने का निश्चय किया. एक दिन जब राजा शिकार खेलने गया हुआ था, तब मंत्री ने सैनिकों को बुलवाकर उस बूढ़े को धमकाया कि वह अपनी झोपड़ी वहां से हटाकर किसी दूर स्थान पर बनाये, किन्तु़ बूढ़ा राजी नहीं हुआ. सैनिक उससे जबरदस्ती करने लगे, तभी राजा शिकार से वापस लौटते हुए वहॉं आ पहुँचा और उसने इस सैनिक कार्रवाई का कारण पूछा. मंत्री ने उसे सारी बात बताई. राजा ने आदेश दिया कि झोपडी को वहीं रहने दिया जाये. उसने मंत्री से कहा, ''लोग जब मेरे महल को देखेंगे तो कहेंगे कि राजा बहुत कला प्रेमी था और जब वे महल के बगल में इस झोपड़ी को देखेंगे तो कहेंगे कि राजा बहुत न्यायप्रिय था.''


आज हमें अपने राजनेताओं से उस राजा जैसी न्यायप्रियता और उदारता की ही अपेक्षा है.

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