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मंगलवार, 11 जनवरी 2011

नये साल की सर्दी और नये साल का आशावाद एक मासूम की नजर से

साल के शुरू में ही सर्दी यानी सिर मुड़ाते ही ओले पड़े। कहॉं तो मैं सोच रहा था कि इस बार सर्दी मैदानी इलाकों में हल्की फुल्की ही रहेगी। लेकिन नये साल की शुरुआत ऐसी भीषण ठण्ड से होगी, इसका अंदेशा न था। देश के पहाड़ी इलाकों में हो रही भयंकर सर्दी का असर मैदानी इलाकों तक भी आ पहुचा है और हमारा लखनऊ शहर भी इससे अछूता नहीं रह गया है। पिछले तीन-चार दिनों से सर्द हवाओं के साथ कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है। केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी होने के नाते शनिवार और रविवार का साप्ताहिक अवकाश जो मिलता है, उसका इस बार सदुपयोग नहीं हो पाया। भीषण ठण्ड की वजह से रजाई में कबूतर की तरह दुबक कर टी.वी. देखता रहा और हर दो घण्टे बाद श्रीमती जी को चाय बनाने की तकलीफ देता रहा। लेकिन चलो, कम से कम लखनऊ में आई पिछले कुछ दिनों की सर्दी की ठिठुरन से और टी.वी. पर समाचारों के माध्यम से पहाड़ी इलाकों में रहने वालों की तकलीफ का कुछ एहसास तो हुआ। वरना हम तो पर्वतवासियों के जीवन से ईर्ष्या करते रहते हैं कि उन्हें रोज स्वर्ग का नजारा देखने को मिलता है और हम मैदानी शहरों में धूल-धक्कड़ खाते रहते हैं, यही समझते हैं कि पहाड़ों से बेहतर सैरगाह और कोई हो ही नहीं सकती।


09.01.11 यानी रविवार का दिन। तीन दिनों के बाद रविवार को दोपहर बारह बजे के बाद अच्छी धूप खिल गई थी। सो मैं रजाई से निकलकर छत पर पहुँच गया धूप-स्नान करने। किसी चीज का महत्व उसके न रहने पर ही पता चलता है। तीन दिन बाद दिखने वाली धूप ऐसी लग रही थी जैसे कोई दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति हो गई हो। पास-पड़ोस के घरों की छतों पर भी ऐसा ही नजारा था। लोग धूप लेने के लिए अपने छतों पर निकल आए थे। तीन दिनों में ही धूप के बगैर लोगों का जो हाल हो गया था, उसे देखकर तो फिल्म ’कोई मिल गया’ के एलियन ’जादू’ की याद आ गई जो धूप से अपनी उर्जा प्राप्त करता है और धूप के बगैर असहाय सा हो जाता है। खैर, चटाई बिछाकर मैं लेट गया और लगा धूप स्नान करने। मेरा ढाई वर्ष का बेटा तेजस भी अपनी नन्हीं साइकिल छत पर दौड़ाने लगा। थोड़ी ही देर में धूप का पूरा फायदे उठाते हुए बच्चों और बड़ों के लोकप्रिय खेल की रंग-बिरंगी झलक आसमान में दिखाई देने लगीं। आसमान में तरह-तरह की पतंगें उड़ने लगी थीं। पतंगबाजी भी गजब का खेल है। बच्चे हों या बड़े सभी इसके दीवाने होते हैं। यह खर्चीला भी नहीं है, इन्डोर भी है और आउटडोर भी यानि घर की छत पर से भी पतंग उड़ा सकते हैं और किसी मैदान से भी। और इसका खेल का मैदान तो विशाल आकाश है। हां कभी-कभी कोई उंची बिल्डिंग, पेड़, किसी छत पर लगा एन्टीना इत्यादि बाधा जरूर पैदा करते हैं पर पतंगबाजों के जोष को ठण्डा नहीं कर सकते। कुछ ही देर में कबूतरों का एक झुण्ड भी एक खास किस्म की सीटी की आवाज पर इधर से उधर मोहल्ले के उपर मंडराने लगा। दरअसल मेरे घर से दो-तीन गली आगे एक घर की छत पर कोई साहब गुनगुनी धूप में कबूतरबाजी कर रहे थे।

तभी एक पतंग कटकर मेरी छत पर आ गिरती है। मेरा बेटा चिल्लाता है, ’पापा, पतंग आ गई। चलो इसे उड़ाएं।’’ मैनें बच्चे के साथ खेल करने के लिए पतंग को उठा लिया है। लेकिन यह क्या, मेरी नजर पतंग के पीछे की तरफ लिखे कुछ शब्दों की तरफ गयी। लिखावट देखकर लगता था कि किसी आठ दस साल के बच्चे ने लिखी है। क्या था उस लिखावट में? मैं उस लिखावट में  पढ् रहा था एक मासूम बच्चे के नजरिये से नये साल का आशावाद। नीचे तस्वीर में देखिये, क्या लिखा है उस पतंग में?

1 टिप्पणी:

सतीश सक्सेना ने कहा…

यह एक बेहतरीन रचना है ! आपके सुन्दर मन को शुभकामनायें !
ब्लॉग जगत का चरित्र यहाँ दिख रहा है एक भी कमेन्ट नहीं ....
:-(