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गुरुवार, 24 मार्च 2011

चक्कर स्कूल एडमीशन का

14 फरवरी को होता है वैलेन्टाइन डे। लेकिन मैं यहां वैलेन्टाइन डे पर पोस्ट लिखने नहीं बैठा। दरअसल 14 फरवरी’2011 मेरे लिए कुछ दूसरे मायनों में खास रहा। दिन था सोमवार। इसी दिन मैनें अपने बेटे तेजस का स्कूल में प्रि-नर्सरी कक्षा में दाखिला कराया। जनाब 28 अप्रैल को पूरे तीन साल के हो जायेंगें। कुछ अजीब संयोग ही है कि 28 अप्रैल 2008 को मेरे बेटे का जन्म हुआ, उस दिन भी सोमवार ही था। छोटे नवाब दिन भर घर में दून काटते रहते थे। चूँकि  घर में और कोई छोटा बच्चा नहीं है इसलिए बड़ों को दिन भर सर खपाना पड़ता था। बस, एक दिन घर में पंचायत हुई और यह निर्णय हुआ कि बच्चे को स्कूल में दाखिल करा देना चाहिए। तेजस मेरी पहली और अभी तक इकलौती संतान है (हालांकि हम पति-पत्नी की योजना है कि अभी अपने देश पर एक अदद बच्चे का बोझ और डालना है) इसलिए उसके एडमीशन के चक्कर में एक अभिभावक के रूप में स्कूल सिस्टम से भी पहली बार पाला पड़ा। कौन सा स्कूल अच्छा है, किस स्कूल तक आवागमन की सुविधायें अच्छी हैं, किस स्कूल में बच्चों को बहलाने-फुसलाने के साधन जैसे झूले, खिलौने वगैरह अच्छे हैं, किस स्कूल की फीस हमारी औकात के अन्दर है, किस स्कूल की टीचर्स बच्चों को मारती-पीटती नहीं हैं, इन सब प्वाइंट्स पर खूब माथा-पच्ची घर के सदस्यों में हुई। दफ्तर में उन सहकर्मियों के साथ भी विचार मंथन हुआ जिन्होंने हाल ही में अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाया। तब जाकर घर से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित एक स्कूल को फाइनलाइज किया गया। पॉंच हजार रुपये की दाखिला फीस और छह सौ रुपये की मासिक फीस के साथ ही मेरे बेटे का आधुनिक युगीन दीक्षा संस्कार हो गया। यह स्कूल मेरे घर के पड़ोस में स्थित राजाजीपुरम कालोनी में है। दरअसल इस स्कूल की स्टेªटेजिक लोकेशन  ही इसके चुनाव का कारण बनी। जिस सड़क पर यह स्कूल स्थित है उसके सामने वाली सड़क के पीछे की ओर ही मेरी ससुराल भी है। मेरी मध्यमवर्गीय मितव्ययितापरक बुद्धि ने हिसाब लगाया- चूँकि  स्कूल सुबह 9 बजे से 12 बजे तक का है, और मेरा ऑफिस भी सुबह 9 बजे से ही है इसलिये सुबह ऑफिस जाते समय बच्चे को स्कूल छोड़ दूंगा । छुट्टी के बाद मेरा साला अपने भांजे को अपने घर लेता जायेगा। आखिर ससुराल वाले किस दिन काम आयेंगे। रहा ऑफिस वक्त पर पहुँचने का सवाल, तो ऑफिस भी घर से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर है, तिस पर सरकारी नौकरी, तो इतनी लेटलतीफी तो कर ही सकते हैं। इतनी तिकड़म करके स्कूल रिक्शे  के आठ सौ रुपये महीने तो बचेंगे।


हालांकि इतने चक्करदार सिस्टम में मुझे, मेरी पत्नी, मेरे ससुरालियों सबको बड़ी परेशानी  हो रही है, कई बार ऑफिस के लिए कुछ ज्यादा ही देर हो जाती है. किसी दिन तेजस के मामा उसे लेने के लिए देर से स्कूल पहुँचते हैं, उधर स्कूल प्रबंधन भी रोज रिक्शा लगवाने के लिए मनुहार करता है पर मैं बेशर्मी  से मुस्कुराकर मना कर देता हूँ  और आठ सौ रुपये महीने बचाने के सुख का आनन्द लेता हूँ.


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