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आयो कहॉं से घनश्‍याम

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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

ज्‍योतिषी (कहानी)

दिन के समय वह अपना थैला खोलकर बैठ जाता और अपने सभी व्‍यावसायिक उपकरण जिनमें दर्जन भर कौडि़यां, कपड़े का चौकोर टुकड़ा जिस पर विचित्र रहस्‍मयी आलेखन बने हुए थे, एक किताब और ताड़पत्रों का एक पुलिन्‍दा आदि चीजें शामिल थीं, सामने फैलाकर रख लेता। उसका ललाट पवित्र भस्‍म और सिन्‍दूर से शोभायमान रहता, उसकी ऑंखों में एक अजीब सी चमक रहती, जो लगातार ग्राहकों की राह देखते देखते झलकने लगती थी लेकिन जिसे लोग दैवीय आभा समझ कर विश्‍वास कर लेते थे। तिलकयुक्‍त ललाट और गालों तक उतरते हुए गलमुच्‍छों के बीच स्थित होने के कारण उसकी ऑंखों का तेज और भी बढ़ जाता था। ऐसी वेशभूषा में तो एक मूढ़मति की ऑंखें भी तेजोमय लग सकती थीं। तिस पर वह अपने सिर पर केसरिया रंग की पगड़ी भी पहने रहता। उसका यह रंग-संयोजन कभी असफल नहीं होता था। लोग उसकी तरफ यों खिंचे चले आते थे, जैसे फूलों की ओर मधुमक्खियां। वह टाउन हॉल पार्क से होकर गुजरने वाली सड़क के किनारे इमली के पेड़ के नीचे बैठा करता था। यह जगह कई तरह से उसके लिए अहम थी। इस तंग सड़क पर सुबह से लेकर देर रात तक लोगों की भीड़ आती-जाती रहती थी। इस सड़क पर तमाम तरह के कारोबारी अपना व्‍यवसाय करते थे- दवा विक्रेता, चोरी के बर्तन और कबाड़ बेचने वाले, जादूगर वगैरह, और सबसे बढ़कर सस्‍ते कपड़े बेचने वाला एक दुकानदार जो दिन भर चिल्‍ला-चिल्‍ला कर लोगों का ध्‍यान खींचता रहता था। आवाज लगाने में दूसरा नम्‍बर था एक मूँगफली वाले का, जो अपने माल को रोज नया नाम देता था, जैसे 'बम्‍बई की आइसक्रीम', 'दिल्‍ली का बादाम' वगैरह, और लोग उसके पास भीड़ लगाते रहते थे। भीड़ का एक अच्‍छा हिस्‍सा उस ज्‍योतिषी के पास भी जुटता था। मूँगफली वाले की मूँगफलियों के ढेर पर जलती हुई बत्‍त्‍ती के सहारे ही ज्‍योतिषी का धंधा चलता था। इस जगह का कुछ आकर्षण इस वजह से भी था कि वहॉं पर नगर पालिका की कोई प्रकाश व्‍यवस्‍था नहीं थी। जो कुछ रोशनी थी वह दुकानों की वजह से थी। कुछ में सॉंय-सॉंय करती गैस लाइटें जलती रहतीं, कुछ में खम्‍भों से बंधी खुली बत्तियां और कुछ में लैम्‍प जलते रहते थे। ज्‍योतिषी की तरह इक्‍का-दुक्‍का लोग ऐसे भी थे जो दूसरों की बत्तियों के सहारे ही अपना काम चला लिया करते थे। कुल मिलाकर यह जगह रोशनी की किरणों के बीच आती-जाती छायाओं का अजीब सा ताना-बाना प्रतीत होती थी। यह माहौल ज्‍योतिषी के लिए बहुत उपयुक्‍त था, क्‍योंकि उसने तो कभी ज्‍योतिषी बनने के बारे में सोचा ही नहीं था। वह अपने खुद के भविष्‍य के बारे में कुछ नहीं जानता था। ज्‍योतिषी विद्या के बारे में वह उतना ही जानता था जितना उसके भोले-भाले ग्राहक। लेकिन उसे अपनी बातों से लोगों को खुश करना और अचरज में डाल देना, दोनों आता था। यह केवल थोड़ी सी सहज बुद्धि, अनुमान और चतुराई का खेल था। फिर भी ईमादारी से देखा जाये तो दूसरे कामों की तरह इस काम में भी मेहनत की जरूरत थी और दिन भर के बाद उसकी जो कमाई होती थी, उसका वह वास्‍तव में हकदार था।

वह बिना कुछ सोचे-विचारे अपना गॉंव छोड आया था। अगर वह वहॉं रहता, तो अपने पुरखों की खेती सम्‍भाल रहा होता और अपने पैत़ृक घर में आराम से विवाहित जीवन बिता रहा होता। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। किसी को बताये बगैर उसे अपना घर छोड़ना पड़ा और वह तब तक नहीं रुका जब तक गॉंव से कुछ सौ मील दूर नहीं निकल गया। एक गॉंववाले के लिए यह दूरी बहुत थी, मानों समुन्‍दर पार का फासला हो।

वह मानव जीवन के तमाम दुखों का अच्‍छा विश्‍लेषण कर लेता था- विवाह, सम्‍पत्ति, मानवीय संबंधों की उलझनें। लम्‍बे अभ्‍यास ने उसकी समझ को पैना कर दिया था। पॉंच मिनट के अन्‍दर वह भॉंप लेता था कि माजरा क्‍या है। वह हर सवाल के लिए तीन पाई लेता था, जब तक सामने वाला व्‍यक्ति कम से कम 10 मिनट तक न बोल ले, तब तक वह अपना मुँह नहीं खोलता था, ताकि उसे दर्जन भर सवालों और सुझावों के लिए पर्याप्‍त जानकारी मिल सके। जब वह सामने वाले व्‍यक्ति की हथेली देखकर कहता, ''तुम्‍हें अपने प्रयत्‍नों का पूरा फल नहीं मिल रहा है'', तो दस में से नौ लोग उसकी बात मान लेते थे। या वह सवाल करता, ''क्‍या तुम्‍हारे घर-परिवार या रिश्‍तेदारी में कोई ऐसी स्‍त्री है जिसका व्‍यवहार तुम्‍हारे प्रति ठीक नहीं है?'' या फिर वह चारित्रिक विश्‍लेषण करते हुए कहता, ''तुम्‍हारी अधिकांश समस्‍याओं का कारण तुम्‍हारा स्‍वभाव है। तुम्‍हारे शनि की जो स्थिति है, उसे देखते हुए यह तो होना ही है। तुम रोबदार स्‍वभाव और कठोर डील-डौल के स्‍वामी हो।'' यह सुनकर लोगों का हृदय प्रसन्‍नता से भर जाता था, क्‍योंकि हममें से कोमल से कोमल व्‍यक्ति भी अपने आपको कठोर व्‍यक्तित्‍व का स्‍वामी समझता है।

मूँगफली वाले ने अपनी बत्‍ती बुझाई और उठकर घर चला गया। यह ज्‍योतिषी के भी उठने का संकेत था, क्‍योंकि अब उसके लिए बिल्‍कुल अंधेरा हो चुका था, केवल हरी रोशनी की एक लकीर कहीं से आती हुई उसके सामने जमीन पर पड़ रही थी। उसने अपनी कौडि़यां और बाकी सामान उठाया और उन्‍हें थैले में रख ही रहा था, कि हरी रोशनी की लकीर मिट गयी। उसने ऊपर देखा तो सामने एक आदमी खड़ा था। शायद कोई ग्राहक है, सोचकर उसने कहा, ''तुम परेशान दिख रहे हो। यहॉं बैठो और मुझसे बात करो, तुम्‍हें अवश्‍य लाभ होगा।'' उस आदमी ने कुछ अस्‍पष्‍ट सा उत्‍तर दिया। ज्‍योतिषी ने अपना आमंत्रण दोहराया। उस आदमी ने अपनी हथेली ज्‍योतिषी की नाक के ठीक नीचे लाकर कहा, ''तुम अपने आप को ज्‍योतिषी कहते हो?'' ज्‍योतिषी को चुनौती मिलती हुई प्रतीत हुई और उसने उसकी हथेली को हरी रोशनी में लाकर देखा और कहा, ''तुम्‍हारा स्‍वभाव..............''
''बकवास बन्‍द करो। मुझे कोई काम की बात बताओ।'' उस आदमी ने कहा।
ज्‍योतिषी ने स्‍वयं को अपमानित महसूस किया। वह बोला, ''मैं हर सवाल के लिए तीन पाई लेता हूँ और जो कुछ तुम जानना चाहते हो, उसकी कीमत देनी होगी।''
इस पर उस आदमी ने एक आना निकालकर ज्‍योतिषी की ओर फेंका, ''मुझे कुछ सवाल पूछने हैं। अगर तुम धोखेबाज निकले, तो तुम्‍हें यह आना सूद समेत मुझे वापस करना होगा।''
''अगर मेरे जवाब सही हुए, तो क्‍या तुम मुझे पॉंच रुपये दोगे?''
''नहीं।''
''क्‍या आठ आने दोगे?''
''ठीक है, एक शर्त पर, अगर तुम गलत हुए तो तुम्‍हें इसका दूना मुझे वापस देना होगा।''
कुछ देर और बहस के बाद समझौता हो गया। ज्‍योतिषी ने आसमान की ओर कुछ प्रार्थना की, तब तक वह अजनबी अपना सिगार जलाने लगा। माचिस की रोशनी में ज्‍योतिषी ने उसके चेहरे की एक झलक देखी। सड़क पर जाम लगा हुआ था, गाडि़यां हॉर्न बजा रहीं थीं, तॉंगवाले अपने घोड़ों को टिटकारियां दे रहे थे, और भीड़ का शोरगुल पार्क के अन्‍धकारमय वातावरण को दहला रहा था। वह अजनबी सिगार का कश लेते हुए और धुआं उड़ाते हुए बेरुखी के साथ वहीं बैठ गया। ज्‍योतिषी बहुत असहज महसूस कर रहा था।

''अपना एक आना वापस रखो। मैं ऐसी चुनौतियों का आदी नहीं हूँ। आज मुझे देर हो गयी है़.........'' वह सामान बॉंधकर तैयार होने लगा।'' अजनबी ने उसकी कलाई पकड़ ली और बोला, ''अब तुम ऐसे नहीं जा सकते। मैं जा रहा था और तुमने मुझे बुलाकर बिठाया था।'' उसकी पकड़ से ज्‍योतिषी कांप उठा, वह मरियल और कांपती हुई आवाज में बोला, ''मुझे आज जाने दो, मैं कल तुमसे बात करूँगा।''  अजनबी ने अपनी हथेली उसके चेहरे के सामने लाकर कहा, ''चुनौती चुनौती होती है। चलो बताओ।'' सूखते गले से ज्‍योतिषी ने बताना शुरू किया, ''कोई औरत है जो.........''
''चुप करो'', अजनबी ने कहा, ''मैं यह सब नहीं जानना चाहता। मैं अपनी खोज में कामयाब होऊंगा या नहीं? इसका जवाब दो और फिर तुम जा सकते हो। वरना मैं तुम्‍हारे सारे पैसे निकलवाये बगैर तुम्‍हें जाने नहीं दूँगा।''
ज्‍योतिषी ने कुछ मन्‍त्र बुदबुदाये और बोला, ''ठीक है, मैं बताऊंगा। लेकिन अगर मेरी बात सही हुई  तो क्‍या तुम मुझे एक रुपया दोगे? वरना मैं अपना मुँह नहीं खोलूँगा, तुम चाहे जो कर लो।''
काफी मोलभाव के बाद अजनबी राजी हो गया।
ज्‍योतिषी ने कहा, ''तुम मौत के मुँह में जाते-जाते बचे थे।''
''हॉं।'' अजनबी ने अपनी छाती खोलकर निशान दिखाया, ''और?''
''और तुम्‍हें खेत  के पास वाले कुऍं में किसी ने धक्‍का दे दिया था। तुम्‍हें मरने के लिए छोड़ दिया था।''
''मैं तो मर ही गया था, अगर किसी राहगीर ने कुऍं में झॉंक कर न देखा होता।'' अजनबी ने उत्‍साह के अतिरेक में बताया। ''मैं उस आदमी तक कब पहुचूँगा?'' उसने अपनी मुट्ठी भींचते हुए कहा।
''परलोक में,'' ज्‍योतिषी ने उत्‍तर दिया। ''चार महीने पहले यहां से दूर एक कस्‍बे में उसकी मौत हो गयी। अब तुम उसे कभी नहीं देख पाओगे।'' अजनबी यह सुनकर तड़प उठा।
''गुरु नायक.....''
''तुम मेरा नाम जानते हो?'' उसने अचरज से कहा।
''मैं और भी बहुत कुछ जानता हूँ। गुरु नायक, जो मैं कह रहा हूँ, उसे ध्‍यान से सुनो। मैं देख रहा हूँ कि अगर तुम घर से बाहर रहे तो तुम्‍हारी जान को एक बार फिर खतरा हो सकता है।'' उसने एक चुटकी भर भस्‍म निकाली और उसे दी, ''इसे अपने माथे पर लगा लो और घर जाओ। दुबारा कभी दक्षिण की ओर यात्रा मत करना, तुम सौ साल जियोगे।''
''अब मैं भला घर क्‍यों छोड़ने लगा?'' अजनबी ने कुछ सोचते हुए कहा, ''मैं तो केवल उसी की तलाश में भटक रहा था कि वह मुझे मिले और मैं उसका दम घोंटकर उसे मार डालूँ।'' उसने पश्‍चाताप में सिर हिलाया। ''वह मेरे हाथों से बच गया। उम्‍मीद करता हूँ कि उसे जैसी मौत मिलनी चाहिए थी, वैसी ही मिली होगी।''
''वह एक लॉरी के नीचे कुचलकर मारा गया।''
यह सुनकर अजनबी को बड़ी तसल्‍ली हुई।

जब तक ज्‍योतिषी ने अपना सारा सामान थैले में रखा, तब तक एकदम सन्‍नाटा हो चुका था। हरी रोशनी की लकीर भी गायब हो चुकी थी और वह जगह एकदम अंधकारमय और सुनसान हो गयी थी। वह अजनबी भी ज्‍योतिषी को पैसे देने के बाद अंधेरे में गायब हो गया था।

आधी रात के करीब ज्‍योतिषी घर पहुँचा। उसकी पत्‍नी जो दरवाजे पर इन्‍तजार कर रही थी, उसने देरी का कारण पूछा। उसने पैसे पत्‍नी को दिये और बोला, ''लो गिनो इन्‍हें। ये सारे पैसे एक ही आदमी ने दिये हैं।''
''साढ़े बारह आने'' पत्‍नी गिनकर बोली। वह बहुत खुश थी, ''कल मैं थोड़ी सी खांड (चीनी) और कुछ नारियल खरीद कर लाऊंगी। बच्‍ची कई दिन से मिठाई के लिए जिद कर रही है। कल मैं उसके लिए अच्‍छी चीजें बनाऊंगी।''
''सुअर के बच्‍चे ने मुझे धोखा दिया। उसने एक रुपये देने का वायदा किया था।'' ज्‍योतिषी ने कहा। उसने पति की ओर देखा, ''तुम कुछ परेशान हो। कोई गड़बड़ हो गयी है?''
''कुछ नहीं।''

रात को खाने के बाद वह बिस्‍तर पर बैठा और पत्‍नी को बताया, ''तुम्‍हें पता है आज मेरे सिर से एक बहुत बड़ा बोझ हट गया। इतने सालों तक मैं यही समझता रहा कि मेरे सिर पर एक आदमी की हत्‍या का पाप है। इसी कारण मैं गांव से भागकर यहां आकर रहने लगा, तुमसे विवाह किया। वह आदमी जिन्‍दा है।''

उसने आश्‍चर्य से कहा, ''तुमने हत्‍या करने की कोशिश की थी?''

''हॉं, हमारे गॉंव में, तब मैं एक मूर्ख नौजवान था। एक दिन हमने शराब पी, जुऑं खेला, और आपस में झगड़ने लगे- अब यह सब क्‍यों सोचना? सोने का वक्‍त हो गया है।'' उसने जम्‍हाई लेकर कहा, और बिस्‍तर पर पसर गया।

(आर. के. नारायण की कहानी 'An Astrologer's Day' का अनुवाद)

1 टिप्पणी:

ZEAL ने कहा…

पाखण्ड उजागर करती उम्दा कहानी ।