मेरी बात:


आयो कहॉं से घनश्‍याम

प्रशंसक

शुक्रवार, 10 जून 2011

बन्‍दर का पंजा - डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू जैकब्‍स की विश्‍वप्रसिद्ध हॉरर स्‍टोरी

विलियम वाईमार्क जैकब्‍स (गूगल चित्र से साभार) 
 
''बन्‍दर का पंजा'' विलियम वाईमार्क जैकब्‍स की विश्‍वप्रसिद्ध कहानी है। विलियम वाईमार्क जैकब्‍स (8 सितम्‍बर, 1863 - 1 सितम्‍बर, 1943) एक अंग्रेज कथाकार और उपन्‍यासकार थे। समुद्री जीवन और उससे जुड़े लोग उनके लेखन के प्रमुख विषय थे। उनका पहला कहानी संग्रह 'Many Cargoes' 1896 में प्रकाशित हुआ था। उनकी अधिकतर रचनाओं में हास्‍य का पुट देखने को मिलता है। लेकिन आज अंग्रेजी साहित्‍य में उन्‍हें अपनी दो हॉरर कहानियों 'The Monkey's Paw' और 'The Toll House' के लिये याद किया जाता है।  इनमें से पहली कहानी 1902 में 'The Lady of the Barge' नामक कहानी संग्रह में प्रकाशित हुई थी और दूसरी कहानी वर्ष 1909 में 'Sailors' Knots' कहानी संग्रह में प्रकाशित हुई थी। 
 
'The Monkey's Paw' उनकी सर्वप्रसिद्ध कहानी है। यह कहानी अंग्रेजी की सर्वश्रेष्‍ठ हॉरर कहानियों में अपना स्‍थान रखती है। यह कहानी इतनी लोकप्रिय हुई कि बाद में एकांकी के रूप में इसका मंचन भी किया गया। इसके एकांकी रूपान्‍तर को तमाम समीक्षक अंग्रेजी भाषा का पहला आधुनिक एकांकी मानते हैं। बाद में रेडियो रूपक के रूप में भी इसका प्रसारण किया गया। इस कहानी पर आधारित मूक और सवाक दोनों तरह की फिल्‍में बनी और टी0वी0 पर इस कहानी पर आधारित हॉरर शो भी प्रसारित हुए।  यहां प्रस्‍तुत है इसी कहानी का हिन्‍दी अनुवाद -

(गूगल इमेज से साभार)

(1)

बाहर रात ठण्‍डी और भीगी थी, लेकिन लैबरनम विला के छोटे से बैठक कक्ष में खिड़की के पर्दे बन्‍द थे और तेज आग जल रही थी। पिता और पुत्र शतरंज खेल रहे थे, पिता जो कि खेल में नयी चालें सोचता था, बार-बार अपने बादशाह को ऐसे प्रत्‍यक्ष और अनावश्‍यक खतरों में डाल देता था कि आग के पास शान्तिपूर्वक बैठकर बुनाई कर रही सफेद बालों वाली महिला भी टोकने लगती थी।

''हवा की आवाज सुनी'' श्रीमान ह्वाइट ने कहा, जिन्‍होंने अपनी एक गलत चाल को समझने में बहुत देर कर दी थी और अब अपने पुत्र को इस गलती को देखने से मित्रवत ढंग से रोकना चाहते थे।

''मैं सुन रहा हूँ'', पुत्र ने गम्‍भीरतापूर्वक बिसात को देखते हुए कहा और अपना हाथ बढ़ाया, 'शह।'

''मुझे नहीं लगता कि आज रात वह आयेगा।'' अपना हाथ बिसात पर रोकते हुए पिता ने कहा।

''मात'', पुत्र ने जवाब दिया।

 ''यह तो सबसे बेकार जिन्‍दगी है'', श्रीमान ह्वाइट ने आकस्मिक और अप्रत्‍याशित गुस्‍से के साथ चीखते हुए कहा, ''तमाम जंगली और बर्फीली जगहों में से यह जगह रहने के लिए सबसे बेकार है। गली दलदल बनी हुई है, सड़कों पर पानी भरा हुआ है। मुझे समझ नहीं आता लोग क्‍या सोच रहे हैं। मुझे लगता है कि वे सोचते हैं कि चूँकि इस सड़क पर  केवल दो ही घर किराये पर हैं, इसलिये कोई फर्क नहीं पड़ता।''

''कोई बात नहीं प्रिये'', उनकी पत्‍नी ने मरहम लगाते हुए कहा, ''शायद तुम अगली बाजी जीत जाओ।''

श्रीमान ह्वाइट ने अपनी पैनी नजरों से ऊपर देखा, ठीक उसी समय जब मॉ-बेटे की निगाहें आपस में मिल रहीं थीं। उनके शब्‍द उनके होठों पर ही खत्‍म हो गये और अपनी आपराधिक हंसी को उन्‍होनें हल्‍की सफेद दाढ़ी में छिपा लिया। 

'वह आ गया', श्रीमान ह्वाइट ने कहा, जब फाटक जोर से बन्‍द हुआ और भारी कदमों की आवाज दरवाजे की ओर आती सुनाई दी।

वृद्ध पुरुष मित्रवत् और स्‍वागतपूर्ण शीघ्रता के साथ उठा और नवागन्‍तुक के साथ सहानुभूति जताने लगा। नवागन्‍तुक ने भी स्‍वयं से सहानुभूति जताई, जिस पर श्रीमती ह्वाइट ने अस्‍वीकृति जताते हुए धीरे से खॉंसा, जबकि उनके पति ने कमरे में प्रवेश किया और उनके पीछे एक लम्‍बा तगड़ा, छोटी गोल ऑंखों और रक्तिम मुखमण्‍डल वाला आदमी अन्‍दर आया।

'सार्जेन्‍ट-मेजर मॉरिस', उसका परिचय कराते हुए उन्‍होंने कहा।

सार्जेन्‍ट-मेजर ने सबसे हाथ मिलाया और आग के पास रखी गई कुर्सी पर बैठ गया और सन्‍तोषपूर्ण निगाहों से देखने लगा कि उसके मेजबान ने व्हिस्‍की और गिलास निकाल लिये थे और तॉंबे की एक छोटी केतली आग पर चढ़ा दी थी।

तीसरा गिलास लेने पर उसकी ऑंखों की चमक कुछ बढ़ी और उसने बात करना शुरू किया, जबकि पूरा परिवार उत्‍सुकता से उसकी दूर-दराज की बातें सुनने लगा, उसने अपने चौड़े कन्‍धों को कुर्सी में और फैला लिया और जंगल की घटनाओं और साहसिक कार्यों, युद्धों, खतरनाक जानवरों और अजीबोगरीब लोगों के बारे में बताने लगा।

 'बीस वर्ष हो गये', श्रीमान ह्वाइट ने अपनी पत्‍नी और पुत्र की ओर देखते हुए स्‍वीकृतिसूचक सिर हिलाकर कहा, 'जब यह गया था, तो गोदाम में काम करने वाला एक नौजवान था। अब इसे देखो।'

'अब भी ज्‍यादा बुरे नहीं लग रहे हैं', श्रीमती ह्वाइट ने नम्रतापूर्वक कहा।

''मैं भी हिन्‍दुस्‍तान जाना चाहता हूँ', वृद्ध व्‍यक्ति ने कहा, 'मतलब थोड़ा बहुत जानने-समझने के लिये।'

'आप जहॉं हैं, वहीं रहें तो अच्‍छा है।' सार्जेन्‍ट-मेजर ने सिर हिलाते हुए कहा। उसने खाली गिलास रख दिया, और धीमी सॉंस लेते हुए दुबारा सिर हिलाया।

'मैं पुराने मन्दिरों, फकीरों और मदारियों को देखना चाहता हूँ।' वृद्ध व्‍यक्ति ने कहा, 'तुमने एक दिन मुझे किसी बन्‍दर के पंजे या ऐसी ही किसी चीज के बारे में बताना शुरू किया था मॉरिस़़?'

'कुछ नहीं।' मॉरिस ने हड़बड़ाकर कहा, 'कोई खास जानने लायक बात नहीं है।'

'बन्‍दर का पंजा' श्रीमती ह्वाइट ने उत्‍सुकता से पूछा।

'शायद यह कुछ-कुछ वैसा ही है जिसे आप जादू कहते हैं।' सार्जेन्‍ट-मेजर ने छूटते ही कहा।

उसके तीनों श्रोता उत्‍सुकतावश आगे झुक आये। आगन्‍तुक ने अन्‍यमनस्‍कता से अपना गिलास ओंठों से लगाया और फिर वापस रख दिया। उसके मेजबान ने फिर भर दिया।

'देखने में-------'' सार्जेन्‍ट-मेजर ने अपनी जेब टटोलते हुए कहा, 'यह एक मामूली छोटा सा पंजा है, सूखकर ममी हो गया है।'

उसने अपनी जेब से कोई चीज बाहर निकाली और दिखाई। श्रीमती ह्वाइट तो मुँह बिचकाकर पीछे हट गयीं, लेकिन उनके पुत्र ने इसे ले लिया और उत्‍सुकतावश इसका निरीक्षण करने लगा।

'और इसमें खास बात क्‍या है?' श्रीमान ह्वाइट ने इसे पुत्र से लेकर पूछा, और इसका निरीक्षण करने के बाद इसे मेज पर रख दिया।

'एक बूढ़े फकीर ने इस पर मन्‍त्र डाल दिया था', सार्जेन्‍ट-मेजर ने बताया, ''बहुत पवित्र आदमी था। वह दिखाना चाहता था कि भाग्‍य लोगों के जीवन पर शासन करता है, और जो लोग इसमें हस्‍तक्षेप करते हैं, उन्‍हें कष्‍ट सहना पड़ता है। उसने इस पर ऐसा मन्‍त्र डाला था कि तीन अलग-अलग व्‍यक्ति अपनी तीन इच्‍छाओं की पूर्ति कर सकते हैं।''

''अच्‍छा तो आप तीन इच्‍छाएं क्‍यों नहीं पूरी कर लेते?'' हरबर्ट ह्वाइट ने चतुराई से पूछा।

उस सिपाही ने उसे इस तरह देखा जैसे कोई अधेड़ आदमी एक धृष्‍ट दुस्‍साहसी नवयुवक की ओर देखता है। ''मैनें की थी', उसने शान्तिभाव से जवाब दिया, और उसका धब्‍बेदार चेहरा सफेद हो गया।

''और क्‍या आपकी तीनों इच्‍छाएं सचमुच पूरी हो गयीं?'' श्रीमती ह्वाइट ने पूछा। 

''पूरी हो गयीं'', सार्जेन्‍ट-मेजर ने कहा, और गिलास अपने दॉंतों में भींच लिया।

''क्‍या किसी और ने इच्‍छा-पूर्ति करके देखा है?'' वृद्ध महिला पीछे पड़ गयी।

''पहले आदमी ने तीन इच्छित चीजें मांगी थीं।  मुझे नहीं  पता कि पहली दो इच्‍छाएं क्‍या थीं, मगर तीसरी इच्‍छा मृत्‍यु की थी। इस तरह यह पंजा मुझे मिल गया।''

उसकी आवाज इतनी गम्‍भीर थी कि पूरे समूह पर सन्‍नाटा छा गया।

''अगर तुम्‍हारी तीनों इच्‍छाएं पूरी हो गयी हैं, तो यह तुम्‍हारे काम का नहीं है मॉरिस।'' वृद्ध पुरुष ने अंत में कहा, ''तुम इसे क्‍यों रखे हुए हो?''

सिपाही ने अपना सिर हिलाया, ''शायद अपनी सनक की वजह से। मुझे इसे बेचने का विचार आया था, लेकिन मुझे लगता नहीं कि यह बिकेगा। इसने पहले ही बहुत गड़बड़ की है। और फिर, लोग नहीं खरीदेंगे। उन्‍हें लगता है यह कोरी कल्‍पना है, और जो लोग थोड़ा बहुत मानते भी हैं वे पहले आजमा कर देखना चाहते हैं उसके बाद पैसा देना चाहते हैं।''

''अगर तुम्‍हारी तीन और इच्‍छाएं हों, तो क्‍या तुम उनकी पूर्ति करना चाहोगे?'' वृद्ध पुरुष ने उसे गौर से देखकर पूछा।

''मुझे नहीं मालूम, मैं नहीं जानता।'' उसने उत्‍तर दिया।

उसने अपने पंजे को उठाया और अपनी तर्जनी और अंगूठे के बीच घुमाते हुए अचानक ही इसे आग में फेंक दिया। ह्वाइट हल्‍का सा चीखते हुए नीचे झुका और उसे वापस झपट लिया।

''इसे जल जाने दो।'' मॉरिस ने दृढ़ता से कहा।

''मॉरिस अगर यह तुम्‍हें नहीं चाहिए तो मुझे दे दो।'' दूसरे व्‍यक्ति ने कहा।

''मैं तो नहीं देता'', उसके मित्र ने हठपूर्वक कहा, ''मैनें तो इसे आग में फेंक दिया था। अगर तुमने इसे रखा तो कुछ भी होने पर मुझे दोष मत देना। समझदारी से काम लो और इसे वापस आग में डाल दो।''

वृद्ध पुरुष ने सिर हिलाकर मना किया और अपनी नई चीज का निरीक्षण करते हुए पूछा, ''इसे प्रयोग कैसे करते हैं?''

''इसे अपने दाहिने हाथ में लेकर उठाओ और अपनी इच्‍छा को जोर से बोलो।'' सार्जेन्‍ट-मेजर बोला, ''लेकिन मैं तुम्‍हें इसके दुष्‍परिणामों के बारे में सावधान किये देता हूँ।''

''यह तो अरेबियन नाइट्स की कहानी जैसा लगता है'', श्रीमती ह्वाइट ने कहा और खाना लगाने लगीं, ''तुम्‍हें नहीं लगता कि तुम मेरे लिए चार जोड़ी हाथ मॉंग सकते हो?''

उसके पति ने वह जादुई चीज जेब से निकाली और तीनों के ठहाके फूट पड़े जबकि सार्जेन्‍ट-मेजर ने, जिसके चेहरे पर खौफ था, उसकी बॉंह पकड़कर कहा, ''अगर तुम्‍हें मांगना ही है, तो कोई ढंग की चीज क्‍यों नहीं मांगते?''

श्रीमान ह्वाइट ने उसे वापस जेब में रख लिया और कुर्सियां लगाकर अपने मित्र को खाने की मेज पर ले गये। खाने के दौरान उस जादुई चीज के बारे में सब लोग भूल गये और खाने के बाद तीनों बैठकर मंत्रमुग्‍ध ढंग से उस सिपाही की भारत-यात्रा के साहसिक कार्यों की दूसरी किश्‍त सुनने लगे।



''अगर बन्‍दर के पंजे की कहानी में केवल उतना ही सच है, जितना कि उसने हमें बताया है, तो हमें इससे ज्‍यादा फायदा होने वाला नहीं है।'' हरबर्ट ने मेहमान को, जिसे आखिरी ट्रेन पकड़नी थी, विदा करने के बाद दरवाजा बन्‍द करते हुए कहा।

''क्‍या तुमने इसके लिए उसे कुछ दिया था?'' श्रीमती ह्वाइट ने अपने पति को करीब से देखते हुए पूछा।

''थोड़ा बहुत'', तनिक उत्‍साह के साथ उन्‍होंने कहा। ''उसने मांगा तो नहीं था, पर मैनें जबरदस्‍ती उसे दे दिया। उसने फिर जोर देकर कहा था कि मैं इस चीज को फेंक दूँ।''

''हो सकता है'' हरबर्ट ने बनावटी डर के साथ कहा, ''हम धनी, प्रसिद्ध और खुशहाल होने जा रहे हैं। पिताजी, आपको सबसे पहले सम्राट बनने की इच्‍छा पूर्ति करनी चाहिए। फिर आपको अपनी पत्‍नी का कहना नहीं मानना पड़ेगा।''

वह मेज का चक्‍कर काटते हुए भागा क्‍योंकि श्रीमती ह्वाइट जिन पर फिकरा कसा गया था, कुर्सी पर बिछाने वाला कपड़ा लिये हुए उसके पीछे दौड़ीं।

श्रीमान ह्वाइट ने अपनी जेब से पंजे को निकाला और इसे संदिग्‍धतापूर्वक देखा, ''सच तो यह है कि मुझे नहीं मालूम कि कौन सी इच्‍छा पूर्ति करूँ।'' उन्‍होंने धीमे से कहा, ''मुझे लगता है कि मेरे पास सब कुछ है।''

''अगर आप पूरे घर का सफाया कर दें, तो भी आप बहुत खुश रहेंगे, है न?'' हरबर्ट ने अपना हाथ उनके कंधे पर रखते हुए कहा। ''ठीक है, फिर दो सौ पौण्‍ड की रकम मांगिए। इतना काफी होगा।''

उसके पिता ने अपने भोलेपन पर शर्मिन्‍दा होकर मुस्‍कुराते हुए उस ताबीज को ऊपर उठाया, जबकि उनका पुत्र चेहरे पर बनावटी गम्‍भीरता के साथ, जो  मां की ओर आंख से इशारा करते हुए कुछ बदल गयी थी, पियानो पर बैठ गया और कुछ आकर्षक सुर बजाने लगा।

''मैं दो सौ पौण्‍ड की इच्‍छा करता हूँ'' वृद्ध पुरुष ने स्‍पष्‍ट रूप से कहा।

पियानो के  उतार भरे बढि़या सुर ने उनके शब्‍दों का अभिवादन किया कि तभी बीच में ही उस वृद्ध पुरुष की कंपकंपी भरी चीख निकल गयी। उसकी पत्‍नी और पुत्र उसकी ओर दौड़े।

'यह हिल रहा था' वह चीखा, उसने फर्श पर पड़ी हुई उस चीज की ओर क्षोभ भरी दृष्टि डालते हुए कहा।

''जैसे ही मैनें इच्‍छा मांगी, यह मेरे हाथ में सांप की तरह घूम गया।''

''खैर, मुझे पैसा तो दिखाई नहीं दे रहा'' उसके पुत्र ने कहा और उस चीज को उठाकर मेज पर रख दिया, ''और मैं  दावे के साथ कहता हूँ कि पैसा कभी मिलेगा भी नहीं।''

''यह जरूर तुम्‍हारा वहम होगा, पिताजी'' उसकी पत्‍नी ने चिन्‍तापूर्वक उसकी ओर देखकर कहा।

उसने अपना सिर हिलाया, ''कोई बात नहीं, कोई नुकसान तो नहीं हुआ है। लेकिन फिर भी इसने मुझे झटका जरूर दे दिया।''

वे सब फिर आग के पास बैठ गये और दोनों पुरुष अपने सिगार खत्‍म करने लगे। बाहर हवा इतनी तेज थी जितनी पहले कभी न थी और वृद्ध व्‍यक्ति ऊपर सीढि़यों पर दरवाजे की धड़ाम की आवाज सुनकर घबराकर चौंक पड़ा। एक असामान्‍य और अवसादपूर्ण शान्ति उन तीनों के बीच पसर गयी, और तब तक रही जब तक वृद्ध युगल रात में सोने के लिए नहीं उठे।

''मैं आशा करता हूँ कि आपको अपने बिस्‍तर पर एक बड़े थैल में बंधा हुआ पैसा पड़ा मिलेगा'', हरबर्ट ने उन्‍हें शुभरात्रि कहते हुए कहा, '' और जब आप गलत ढंग से पाया हुआ यह पैसा अपनी जेब में रख रहे होंगे तो कोई भयानक चीज अलमारी पर बैठी हुई आपको देख रही होगी।''

वह अंधेरे में अकेला बैठा हुआ, धीमी होती हुई आग को घूर रहा था, और उसमें दिख रहे तरह तरह के चेहरों को निहार रहा था। आखिरी वाला चेहरा इतना भयानक और बन्‍दर जैसा था कि वह आर्श्‍च से इसे निहारता रहा। यह इतना जीवन्‍त हो उठा कि कि एक बेचैन हंसी के साथ उसने इस आग को बुझाने के लिए मेज पर रखे पानी के आधे भरे गिलास की ओर हाथ लपकाया। उसके हाथ में बन्‍दर का पंजा आ गया और कांपते हुए उसने अपना हाथ कोट में पोंछा और बिस्‍तर पर चला गया।


(2)

अगली सुबह नाश्‍ते की मेज पर पसरती हुई जाड़े की धूप में बैठा हुआ वृद्ध पुरुष अपनी आशंकाओं पर हंस रहा था। कमरे में एक प्रकार की नीरस सम्‍पूर्णता का ऐसा आभास था जो पिछली रात को नदारद था, और वह छोटा सा झुर्रीदार पंजा साइडबोर्ड पर इस लापरवाही के साथ रख छोडा गया था कि इससे इसकी शक्तियों के प्रति अविश्‍वास का पता चलता था।

‘’मुझे लगता है सारे बूढ़े सिपाही एक जैसे होते हैं’’, श्रीमती ह्वाइट ने कहा, ‘’ऐसी दकियानूसी बात को सुनना। आज के समय में ऐसे इच्‍छापूर्ति कैसे की जा सकती है?’’ और अगर की जा सकती है तो फिर तुम्‍हें ये 200 पौण्‍ड नुकसान कैसे पहुँचा सकते हैं?’’

‘’हो सकता है इनके सिर पर आसमान से गिर पड़ें’’ हरबर्ट ने मजाकिया लहजे में कहा।

‘’मॉरिस ने कहा था कि चीजें इतनी स्‍वाभाविक रूप से घटित होती हैं कि आप इसे केवल संयोग का नाम दे सकते हैं।‘’

‘’खैर, जब तक मैं वापस न आऊँ, तब तक धन की इच्‍छापूर्ति मत कीजियेगा’, हरबर्ट ने मेज पर से उठते हुए कहा, ‘’मुझे डर है कि इससे आप एक लालची आदमी बन जायेंगे और हमें आपको छोड़ना पड़ेगा।‘’

उसकी मॉं हँस पड़ी, उसके पीछे दरवाजे तक आयी और उसे सड़क पर जाते हुए देखती रही, और वापस नाश्‍ते की मेज पर लौटते हुए वह अपने पति के भोलेपन पर प्रसन्‍न हो उठी थी। फिर भी दरवाजे पर पर डाकिये की दस्‍तक सुनकर तेजी से दौड़ती हुई गई और जब उसने पाया कि डाकिया दर्जी का बिल लेकर आया है, तो वह रिटायर्ड सार्जन्‍ट मेजर की नशेड़ीपन की आदतों का जिक्र करने लगी।

‘’देखना हरबर्ट जब घर आयेगा तो फिर से खिंचाई करेगा’’, जब वे खाने पर बैठे तो वह बोली।

‘’‍फिर भी मैं कहता हूँ कि उस चीज ने मेरे हाथ में हरकत की थी’’, श्रीमान ह्वाइट ने अपने लिये बीयर उड़े‍लते हुए कहा।

‘’तुम्‍हें लगता है ऐसा हुआ था।‘’ उसने सान्‍त्‍वनापूर्वक कहा।

‘’मैं कह रहा हूँ ऐसा हुआ था’’, श्रीमान ह्वाइट ने उत्‍तर दिया। ‘’इसमें सोचने की कोई बात ही नहीं है। मैनें तो केवल़---------क्‍या बात है?’’

उनकी पत्‍नी ने कोई उत्‍तर नहीं दिया। वह बाहर एक व्‍यक्ति की रहस्‍यमय गतिविधियों को देख रही थी, जो असमंजस में घर की ओर झांक रहा था और घर में प्रवेश करने की सोच रहा था। चूँकि उनके दिमाग में 200 पौण्‍ड वाली बात समायी हुई थी, इसलिये श्रीमती व्‍हाइट ने ध्‍यान दिया कि वह अजनबी अच्‍छी वेशभूषा में था, और नयी चमकदार सिल्‍क हैट पहने हुए था। तीन बार वह फाटक पर रुका और फिर आगे बढ़ गया। चौथी बार उसने खड़े होकर फाटक पर अपना हाथ रखा। अचानक ही दृढ़ता के साथ उसने फाटक खोल दिया और अन्‍दर के रास्‍ते की ओर बढ़ा। उसी क्षण श्रीमती हवाइट ने अपने हाथ अपने पीछे कर लिये और शीघ्रता से अपने एप्रन की डोरियां खोलते हुए उस कपड़े को अपनी कुर्सी की गद्दी के नीचे रख दिया।

असहज लग रहे अजनबी को लेकर वह कमरे में आई। उसने उनकी ओर चुपके से देखा और महिला द्वारा कमरे की हालत और वहॉं पड़े हुए अपने पति के कोट के लिए, जो बागवानी के कामों में इस्‍तेमाल होता था, अजनबी से क्षमा मांगने पर वह तल्‍लीनता से सुनता रहा। फिर उन्‍होंने अजनबी के आगमन का कारण जानने के लिए उतनी देर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की, जितना एक स्‍त्री कर सकती है, लेकिन पहले-पहल तो वह विचित्र ढंग से चुप्‍पी साधे रहा।

‘’मुझसे कहा गया था कि---------‘’ अन्‍त में वह बोला और झुककर अपनी पैन्‍ट से सूती कपड़े का एक टुकड़ा निकाला, ‘’मैं ‘मॉ एण्‍ड मेगिन्‍स’ से आया हूँ।‘’

वृद्ध महिला बोली, ‘’क्‍या बात है?’’, हॉंफते हुए उसने पूछा, ‘’क्‍या हरबर्ट को कुछ हो गया है? यह क्‍या है? यह क्‍या है?’’

उसके पति ने हस्‍तक्षेप किया, ‘’शान्‍त हो जाओ मेरी मॉं, बैठ जाओ और अपने आप किसी नतीजे पर मत पहुँचो। मुझे विश्‍वास है कि आप कोई बुरी खबर नहीं लाये हैं।‘’

‘’मुझे अफसोस है---------‘’ आगन्‍तुक ने कहना शुरू किया।

‘’क्‍या उसे कोई चोट लगी है?’’ मॉं बदहवासी में बोली।

आगन्‍तुक ने ‘हॉं’ में सर झुकाया। ‘’बहुत बुरी चोट लगी’’ उसने शान्‍त भाव से कहा, ‘’लेकिन अब उसे कोई कष्‍ट नहीं है।‘’

‘’भगवान का शुक्र है।‘’ वृद्ध महिला ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘’भगवान का शुक्र है।‘’

जब उस आश्‍वस्ति का निर्मम अभिप्राय उसे समझ में आया तो वह अचानक ही फट पड़ी और अपनी आशंका की पुष्टि का भाव उसने अजनबी के चेहरे पर देखा। अपनी सॉंसें थामते हुए अपने भोले पति की ओर मुड़कर अपना कांपता हुआ हाथ उसके हाथों पर रख दिया। वहॉं एक लम्‍बी चुप्‍पी छा गयी।

‘’वह मशीनरी में फंस गया था।‘’ अन्‍त में आगन्‍तुक ने धीमी आवाज में कहा।

‘’मशीनरी में फंस गया था।‘’ श्रीमान ह्वाइट ने अनमनेपन से दुहराया।

‘हॉं—‘’

वह बैठे हुए खिड़की की ओर शून्‍य में ताकने लगे और अपनी पत्‍नी का हाथ अपने हाथों में लेकर, उसी तरह दबाया जैसे चालीस वर्ष पूर्व अपने रोमांस के दिनों में किया करते थे।

‘’वह हमारा इकलौता सहारा था’’, उन्‍होंने आगन्‍तुक की ओर धीरे से उन्‍मुख होकर कहा, ‘’यह बहुत ही पीड़ादायक  है।‘’

अजनबी खॉंसते हुए उठा और धीरे से चलते हुए खिड़की के पास गया। ‘’फर्म ने मुझे आपके इस भीषण दुख में सहानुभूति व्‍यक्‍त करने के लिए भेजा था’’ उसने मुड़कर देखे बिना कहा। ‘’मेरी गुजारिश है कि आप इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि मैं केवल उनका नौकर हूँ और केवल उनकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।‘’

कोई उत्‍तर नहीं मिला: वृद्ध महिला का चेहरा सफेद था, उसकी ऑंखें घूर रही थीं, उसमें कोई स्‍पन्‍दन होता मालूम नहीं पड़ रहा था, उसके पति के चेहरे पर ऐसी भंगिमा थी जैसी उसके मित्र सार्जेन्‍ट के चेहरे पर अपने किसी मिशन की शुरुआत करते वक्‍त हो सकती थी।

‘’मैं कह रहा था कि ‘मॉ एण्‍ड मेगिन्‍स’ की कोई भी जिम्‍मेदारी नहीं बनती है’’ उसने कहना जारी रखा, ‘’इस मामले वे कोई भी देनदारी स्‍वीकार नहीं करते हैं, लेकिन आपके बेटे की सेवाओं को देखते हुए वे आपको मुआवजे के रूप में कुछ रकम देना चाहते हैं।‘’

श्रीमान ह्वाइट ने अपनी पत्‍नी का हाथ छोड़ दिया और अपने पैरों पर खड़े होते हुए आतंकित दृष्टि के साथ उस अजनबी को देखा। उनके मुरझाये हुए ओंठों से शब्‍द निकले, ‘’कितनी?’’

‘’दो सौ पौण्‍ड’’ उत्‍तर मिला।

पत्‍नी की चीख से बेखबर वह वृद्ध व्‍यक्ति धीमे से मुस्‍कुराया, एक अंधे आदमी की तरह अपने हाथ आगे बढ़ाये और एक बेजान बोझ की तरह फर्श पर भरभरा कर गिर पड़ा।


(3)

करीब दो मील दूर, नये विशाल कब्रिस्‍तान में वृद्ध युगल ने अपने मृत बेटे को दफनाया, और अपने उस अंधकारयुक्‍त और सुनसान घर में वापस आ गये। यह सब इतनी जल्‍दी खत्‍म हुआ था कि वे इसे महसूस भी नहीं कर सके और उन्‍हें कुछ और घटित होने की आशा थी - कुछ और जिससे उनका बोझ कम हो, वह बोझ जो उनके वृद्ध हृदय के लिए कुछ अधिक ही भारी था।

लेकिन दिन गुजर गये और आशा का स्‍थान सहनशीलता ने ले लिया, वृद्धावस्‍था की ऐसी निराशापूर्ण सहनशीलता जिसे उदासीनता भी कह सकते हैं। कभी कभी तो वे आपस में एक शब्‍द भी नहीं बोलते थे, और उनके पास बात करने के लिए कुछ नहीं था और उनके दिन लम्‍बे थकान भरे होने लगे।

एक सप्‍ताह बाद, एक रात अचानक ऑंख खुलने  पर वृद्ध व्‍यक्ति ने अपना हाथ बगल में टटोला, वह अकेला था। कमरे में अंधेरा था, खिड़की के पास सिसकने की आवाज आ रही थी।

'वापस आओ', उसने नरम स्‍वर में कहा, ''तुम्‍हें ठण्‍ड लग जायेगी।''

''मेरे बेटे को इससे भी ज्‍यादा ठण्‍ड लग रही है।'' वृद्ध महिला ने कहा और फिर रोने लगी।

सिसकियों की आवाज उसके कानों पर धीमी होती गयी। बिस्‍तर गर्म था और उसकी ऑंखें नींद से बोझल थीं। वह अनियमित ढंग से ऊंघने लगा और सो गया कि अचानक उसकी पत्‍नी की चीख ने उसे जगा दिया।

''पंजा, बंदर का पंजा'', वह पागलों सी चीख पड़ी।

वह घबराकर बोला, ''कहॉं?'' कहाँ है? क्‍या बात है?''

लड़खड़ाते हुए कमरे की दूसरी ओर वह उसके पास आयी, ''मुझे वह चाहिये।'' उसने शान्‍त भाव से कहा, ''तुमने उसे नष्‍ट तो नहीं किया है न?''

''वह मेरे बैठक कक्ष में रखा है, अल्‍मारी में ताखे पर रखा है। क्‍यों?'' उसने आश्‍चर्य पूर्व कहा।

वह एक साथ रोई और हंस पड़ी और झुककर उसके गाल को चूम लिया।

''मैनें इसके बारे में केवल सोचा ही था, उसने उन्‍मादपूर्वक कहा, ''मैनें पहले यह क्‍यों नहीं सोचा? तुमने इस बारे में क्‍यों नहीं सोचा?''

''किस बारे में?'' उसने प्रश्‍न किया।

''बाकी दो इच्‍छाओं के बारे में', उसने शीघ्रता से उत्‍तर दिया। ''हमारी एक ही इच्‍छा पूरी हुई है।''

''क्‍या यह काफी नहीं था?'' वह  उग्र होकर बोला।

''नहीं, हम सबके पास एक और इच्‍छा होती है।'' उसने विजयपूर्वक कहा, ''नीचे जाओ और उसे जल्‍दी लेकर आओ, और हमारे बेटे के पुनर्जीवित होने की कामना करो।''

वह व्‍यक्ति बिस्‍तर पर उठकर बैठ गया और अपने कांपते पैरों पर से चादर हटा कर फेंक दी, ''हे भगवान, तुम पागल हो'', वह गुस्‍से से चिल्‍लाया।

''इसे लेकर आओ'', वह तड़प उठी ''जल्‍दी लेकर आओ और इच्‍छा पूरी करो।- मेरा बेटा। मेरा बेटा।''

उसके पति ने दियासलाई से मोमबत्‍ती जलाई। ''वापस बिस्‍तर पर चलो, तुम्‍हें पता नहीं तुम क्‍या कह रही हो?'' उसने अस्थिरतापूर्वक कहा।

''हमारी पहली इच्‍छा पूरी हो गयी थी'', वृद्ध महिला ने उत्‍तेजनापूर्वक कहा, ''तो दूसरी क्‍यों नहीं मांगते?''

''वह केवल संयोग था'' वृद्ध व्‍यक्ति हकबकाया।

''उसे लेकर आओ और इच्‍छा पूर्ति करो।'' उसकी पत्‍नी उत्‍तेजना से कांपते हुए चिल्‍लाई।

वृद्ध व्‍यक्ति मुड़ा और उसकी ओर देखकर कांपती आवाज में बोला, ''उसे मरे हुए दस दिन हो गये हैं। और फिर, मैनें तुम्‍हें नहीं बताया था कि मैं केवल उसके कपड़ों से ही उसकी पहचान कर पाया था। जब उस समय उसे देखना इतना भयानक था कि तुम देख नहीं सकीं, तो फिर अब कैसे देख सकोगी?''

''उसे वापस बुलाओ'' वृद्ध महिला चीखी और उसे खींचकर दरवाजे के पास ले गयी, ''तुम समझते हो कि मैनें जिस बच्‍चे को अपने हाथों से पाला-पोसा है उससे डर जाऊँगी?'' 


वह अंधेरे में नीचे गया, और बैठक कक्ष में जाकर भट्टी के स्‍थान पर हाथ से टटोला। वह ताबीज अपनी जगह पर था, और इस भय से आशंकित होकर कि कहीं कमरे से निकलने से पहले ही उसकी अनकही इच्‍छा के फलस्‍वरूप उसके बेटे का क्षत-विक्षत शरीर जीवित न हो जाये, उसने अपनी सॉंसों को थामा और तब उसे लगा कि वह दरवाजे की दिशा भूल गया है। वह पसीने से भीग गया, मेज को टटोलते हुए उसने अपना रास्‍ता तलाशा और दीवार के सहारे चलने लगा और उस ताबीज को लिये हुए छोटे गलियारे में पहुँच गया। 


जब वह कमरे में पहुँचा तो उसकी पत्‍नी का चेहरा भी बदला हुआ लगने लगा। उसका चेहरा सफेद और आशामय था और उसकी अस्‍भाविक भंगिमा देखकर वह डर गया। वह उससे भयभीत था। 


''इच्‍छा बोलो'' वह कठोर स्‍वर में बोली। 


''यह मूर्खतापूर्ण और दुष्‍टतापूर्ण काम है।'' वह लड़खड़ाते हुए बोला। 

''इच्‍छा बोलो'', उसकी पत्‍नी ने दुहराया। 


''मैं अपने बेटे के पुनर्जीवित होने की इच्‍छा करता हूँ।'' उसने हाथ उठाकर कहा। 


ताबीज फर्श पर गिर गया और वह भय से खड़ा देखने लगा। फिर वह कांपते हुए एक कुर्सी में धम्‍म से बैठ गया जबकि वृद्ध महिला ऑंखों में चमक लिए खिड़की पर गयी और पर्दे हटा दिये। 

वह सर्दी से ठिठुरने तक बैठा रहा और बीच-बीच में खिड़की से झांकती वृद्ध महिला को को देखता रहा।  मोमबत्‍ती का टुकड़ा जो जलते-जलते चीनी मिट्टी के मोमबत्‍ती स्‍टैण्‍ड के सिरे तक  पहुँच चुका था, छत और दीवारों पर लहराती हुई छायाएं प्रतिबिम्बित कर रहा था, जब तक आखिरी सबसे बड़ी लौ के साथ वह समाप्‍त नहीं हो गया। ताबीज के असफल होने पर एक अनिर्वचनीय शान्ति के साथ वृद्ध व्‍यक्ति वापस रेंगकर अपने बिस्‍तर पर पहुँचा और एक-दो मिनट बाद वृद्ध महिला भी चुपचाप उसके पास पहुँच गयी। 


कोई नहीं बोला, बस चुपचाप घड़ी की टिक-टिक सुनते रहे। एक सीढ़ी की चरमराती आवाज आयी और एक चूहा आवाज करता हुआ दीवार के पास से निकल गया। अंधेरा दमघोंटू था, और थोड़ी देर तक लेटे रहने के बाद, अपना साहस बटोरते हुए वृद्ध पुरुष ने माचिस निकाली और एक तीली जलाकर मोमबत्‍ती लाने के लिये सीढि़यों से नीचे उतरा। सीढि़यां खत्‍म होते ही तीली बुझ गई और वह दूसरी तीली जलाने के लिए रुका, ठीक इसी समय सामने के दरवाजे पर धीरे से दस्‍तक हुई, इतनी धीमी और चुपके से कि उसे मुश्किल से सुना जा सकता था। 


उसके हाथों से तीलियां गिर गयीं और गलियारे में बिखर गयीं। वह गतिहीन खड़ा था, उसकी सांस अटकी हुई थी कि दरवाजे पर दोबारा दस्‍तक हुई। वह वापस मुड़ा और तेजी से कमरे में भागा और कमरे का दरवाजा अन्‍दर से बंद कर लिया। तीसरी बार दस्‍तक पूरे घर में गूँज गयी। 


'वह क्‍या है?'' चौंककर वृद्ध महिला ने पूछा। 


''चूहा'', वृद्ध पुरुष बोला, ''चूहा था। सीढि़यों पर मेरे बगल से निकला था।'' 


उसकी पत्‍नी बिस्‍तर में उठकर बैठ गयी और सुनने लगी। एक जोरदार दस्‍तक पूरे घर में गूँज गयी। 


''हरबर्ट है। हरबर्ट है।'' वह चीखी। 


वह दरवाजे की ओर लपकी लेकिन उसका पति सामने आकर खड़ा हो गया, और उसकी बांह कसकर पकड़ ली। 

''तुम क्‍या करने जा रही हो?'' वह भराई हुई आवाज में फुसफुसाया। 

''मेरा बेटा है, हरबर्ट'', वह यंत्रवत ढंग से संघर्ष करते हुए चिल्‍लायी, '' मैं तो भूल ही गयी थी कि उसे दो मील दूर से आना है। तुम मुझे रोक क्‍यों रहे हो? जाने दो। मुझे दरवाजा खोलना है।'' 

''भगवान के लिये उसे अंदर मत आने दो।'' वृद्ध व्‍यक्ति कांपते हुए चिल्‍लाकर बोला। 

''तुम अपने बेटे से डरते हो'' उसने संघर्ष करते हुए चीखकर कहा, ''मुझे जाने दो। हरबर्ट, मैं आ रही हूँ। मैं आ रही हूँ।'' 


दरवाजे पर एक और दस्‍तक हुई, फिर एक और, फिर एक और---। वृद्ध महिला ने ने अचानक झटके से अपने आपको स्‍वतन्‍त्र कर लिया और कमरे से बाहर भागी। उसका पति भी पीछे दौड़ा और विनयपूर्वक उसे पुकारने लगा जबकि वह सीढि़यों से नीचे उतर रही थी।वृद्ध व्‍यक्ति ने सांकल खुलने की और नीचे की चटकनी सुनने की आवाज सुनी। फिर वृद्ध महिला की तनावपूर्ण और हॉंफती हुई आवाज। 


''चटकनी', वह जोर से चिल्‍लाई, ''नीचे आओ। मैं इस तक पहुँच नहीं पा रही हूँ।'' 


लेकिन उसका पति अपने हाथों-पैरों के बल फर्श पर पड़े हुए ताबीज को ढूँढ रहा था। अगर उसके दरवाजा खोलने से पहले ही यह उसे मिल जाये तो---। लगातार दस्‍तकों की बौछार से घर गूँज रहा था, और उसने कुर्सी घिसटने की आवाज सुनी क्‍योंकि उसकी पत्‍नी दरवाजे के पास कुर्सी को रख रही थी। उसने चटकनी के धीरे से खुलने की आवाज सुनी, ठीक उसी क्षण वह पंजा उसके हाथ में आ गया और हड़बड़ी में उसने तीसरी इच्‍छा बुदबुदाई। 


दस्‍तक अचानक बन्‍द हो गयी, हालांकि इसकी प्रतिध्‍वनियां अब भी घर में गूँज रही थीं। उसने कुर्सी के पीछे खिसकने की आवाज सुनी, और दरवाजा खुल गया। एक ठण्‍डी हवा का तेज झोंका सीढि़यों से होकर गुजर गया, और दुख और निराशा से भरे पत्‍नी के तीव्र विलाप के बीच वह साहस बटोरकर दौड़ता हुआ पहले तो उसके पास गया और फिर बाहर फाटक की ओर। शान्‍त और निर्जन सड़क के दूसरी ओर स्‍ट्रीट लैम्‍प जगमगा रहा था। 

-समाप्‍त-

9 टिप्‍पणियां:

सलीम ख़ान ने कहा…

great article!

Swachchh Sandesh

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

इस शानदार रचना को हम तक पहुंचाने का शुक्रिया।

---------
हॉट मॉडल केली ब्रुक...
लूट कर ले जाएगी मेरे पसीने का मज़ा।

Archana ने कहा…

shukriya

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut achha laga ise padhna

mahendra verma ने कहा…

कहानी तो बड़ी रोचक लग रही है। अभी थोड़ा सा ही पढ़ा है। फुरसत में पूरा पढ़ूंगा ,रात में।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

great horror.

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

कहानी बहुत अच्छी चल रही थी लेकिन अंत में क्या हुआ, मुझे ये स्पष्ट नहीं हो सका। सब तारीफ़ कर रहे हैं और मैं नहीं समझ पाया तो मेरी अक्षमता ही रही होगी। फ़िर भी एक विश्वप्रसिद्ध कहानी हम तक पहुँचाने के लिये शुक्रिया।

Vivek Jain ने कहा…

शानदार रचना,
शुक्रिया,

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

singhSDM ने कहा…

इस पोस्ट के मार्फ़त मैं तो पहली बार इस ब्लॉग पर आया. बहुत अच्छा लगा. रचना बहुत सार्थक और प्रभावशाली है. अनुवाद हमेशा मुश्किल कार्य होता है....क्योंकि जरूरी नहीं कि जिस भावना से मूल कथा क्लिखी गयी हो वही भाव अनुवाद में बने रहें... मगर इस चुनौती को आपने सफलता पूर्वक स्वीकार किया है... !!! आभार