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शनिवार, 18 जून 2011

भिखारी - गाय दी मोपासां की कहानी

गाय दी मोपासां - गूगल चित्र से साभार 

हेनरी रेने अल्‍बर्ट गाय दी मोपासां (5 August 1850 – 6 July 1893) 19वीं सदी के फ्रांसीसी उपन्‍यासकार, कहानीकार और कवि थे जिनकी गणना आधुनिक अंग्रेजी कहानी के प्रतिपादकों में की जाती है। वह निर्विवाद रूप से फ्रांस के सबसे महान कथाकार हैं।

इनकी प्रथम कहानी संग्रह ‘बाल ऑप फैट’ थी जिसके प्रकाशित होते ही ये प्रसिद्ध हो गए। 1880 से 1891 तक का समय इनके जीवन का सबसे महत्पूर्ण काल था। इन 11 वर्षों में मोपांसा के लगभग 300 कहानियाँ, 6 उपन्यास, 3 यात्रा संस्मरण एवं एक कविता संग्रह प्रकाशित हुए। युद्ध, कृषक जीवन, स्त्री पुरुष संबंध, आभिजात्य वर्ग और मनुष्य की भावनात्मक समस्याएँ मोपासां की रचनाओं की विषय-वस्तु बने। फ्रांसीसी साहित्‍यकार बाल्‍जाक का अनुसरण करते हुए मोपासां ने अतियथार्थवादी और अतिकाल्‍पनिक दोनों प्रकार की रचनायें लिखीं।

महान पाश्‍चात्‍य साहियकार गुस्‍ताव फ्लावर्ट के शिष्‍य मोपासां की कहानियों की खासियत उनकी मितभाषिता एवं सहज नाटकीय संरचना है। उनकी तमाम कहानियां 1870 के दशक के फ्रांस-जर्मनी युद्ध की पृष्‍ठभूमि में रची गई हैं जिनमें युद्ध की अनावश्‍यकता को रेखांकित किया गया है। 

मोपासां की कहानियों के कथानक बहुत चतुराई से रचे गये हैं। ओ0 हेनरी और विलियम समरसेट मॉघम जैसे लेखकों ने उन्‍हीं के कथानकों से प्रेरणा ली थी। मॉघम और हेनरी जेम्‍स ने उनकी कुछ कहानियों के कथानकों को तोड़-मरोड़कर अपनी कहानियों में शामिल भी किया है। 

यहॉं प्रस्‍तुत है मोपासां की कहानी ‘The Beggar’ का हिन्‍दी अनुवाद- 

गूगल चित्र से साभार


अपनी हालिया गरीबी और लाचारी के बावजूद उसने कभी अच्‍छा वक्‍त भी देखा था। 


पंद्रह साल की उम्र में वारविले हाईवे पर एक गाड़ी के नीचे आकर उसकी दोनों टांगें कुचल गयीं थीं। तब से वह सड़कों और खेतों के पास घिसटता चलता भीग मॉंगता फिरता था, अपनी बैसाखियों के सहारे, जिनके वजह से उसके कंधे उसके कानों तक पहुँचते थे। उसका सिर ऐसा दिखता था मानों दो धेलों के बीच में दबा दिया गया हो। 

ऑल सेन्‍ट्स डे की पूर्व संध्‍या में  एक खाई के किनारे एक परित्‍यक्‍त बालक के रूप में वह लेस बिलेट्स के पादरी को पड़ा मिला था, उन्‍होंने उसका नामकरण किया था - निकोलस टूसेन्‍ट, वह दान में दिये गये पैसों पर पलता था, बिल्‍कुल अनपढ़ था, और एक बार एक नानबाई ने उसे ब्राण्‍डी के कई गिलास पिला दिये थे जिसकी वजह से दुर्घटना में वह अपाहिज हो गया था, और उसके बाद पूरी जिन्‍दगी आवारा: भीख के लिए अपने हाथ फैलाने के सिवा उसे कोई दूसरा काम नहीं आता था। 

एक बार बैरोनेस दी एवारी ने उसे अपने घर से लगे हुए फार्म में बने मुर्गीखाने से सटी हुई घास-फूस से भरी एक खोह में सोने की इजाजत दे दी थी। बहुत जरूरत होने पर उसे रसोईघर से गिलास भर सेब की मदिरा और एक आध टुकड़ा रोटी का मिल जाता था। इसके अलावा, वह वृद्ध महिला अक्‍सर अपनी खिड़की से उसके लिए कुछ पैसे फेंक दिया करती थी। लेकिन अब उसका देहान्‍त हो चुका था। 

गॉंवों में लोग उसे कुछ नहीं देते थे - वह कुछ ज्‍यादा ही जाना-पहचाना था। चालीस बरसों से उसे रोज-ब-रोज लकड़ी की बैसाखियों पर चलते अपने टूटे-फूटे शरीर को दरवाजे-दरवाजे घसीटते हुए  देखते-देखते हर कोई तंग आ चुका था। लेकिन वह कहीं और जाने की हिम्‍मत नहीं कर सकता था, क्‍योंकि वह कस्‍बे के इस इलाके को, इन तीन-चार गांवों को, जहां उसने अपनी दु:ख भरी जिन्‍दगी गुजारी थी, छोड़कर कोई दूसरी जगह जानता ही न था। उसने अपनी भीख मांगने का काम सीमित कर रखा था, और वह किसी भी कीमत पर उन सरहदों से बाहर नहीं जा सकता था, जिनका वह आदी हो चुका था। 


वह तो यह भी नहीं जानता था कि उसकी नजर दूर तक जिन पेड़ों तक पहुँचती थी, उनके पार भी कोई दुनिया थी। वह अपने आप से कोई सवाल नहीं करता था। और जब खेतों या गलियों में हमेशा उसे पाकर किसान बोलते, ''हमेशा यहीं लंगड़ाते रहकर घूमने के बजाय तुम दूसरे गांवों में क्‍यों नहीं जाते?'', वह कोई उत्‍तर नहीं देता, बल्कि चुपके से निकल जाता था, एक अनजाने डर के साथ - डर एक गरीब निरीह प्राणी का, जो हजारों चीजों से डरता है - नये चेहरों से, तानों से, बेइज्‍जती से, अजनबी लोगों की शक भरी निगाहों से, और सड़कों पर चलने वाले पुलिस की टोलियों से। इनमें से आखिरी वालों से वह हमेशा बचकर रहता था, जब उन्‍हें आते देखता तो झाडि़यों या पत्‍थरों के ढेर के पीछे छिप जाता। 

जब वह उन्‍हें धूप में चमकती वर्दियों के साथ दूर से देखता, तो उसमें अचानक असाधारण फुर्ती आ जाती थी - अपनी मॉंद में छिपते हुए जंगली जानवर जैसी फुर्ती। वह अपनी बैसाखियां एक ओर फेंक देता, किसी ढीले गुदड़े की तरह जमीन पर गिर जाता, अपने आपको जितना हो सके सिकोड़ लेता, ऐसे दुबक जाता मानों कोई नग्‍न व्‍यक्ति अपने को ढंकता है, उसके फटे-पुराने कपड़े उसी जमीन के रंग में मिल जाते थे जिसमें वह दुबकता था। 


उसे पुलिस से कभी कोई दिक्‍कत पेश नहीं आई थी, लेकिन उनसे बचकर रहने की प्रवृत्ति उसके खून में भी। ऐसा लगता था जैसे यह आदत उसे अपने अनजान माता-पिता से विरासत में मिली थी। 

उसका कोई ठिकाना नहीं था, सिर पर कोई छत नहीं थी, किसी तरह का कोई आसरा नहीं था। गर्मियों में वह खुले में सोता था और सर्दियों में नजरें बचाकर खलिहानों और तबेलों में बड़ी होशियारी से छिप जाता था। उसकी मौजूदगी का पता चले, इससे पहले ही वह निकल जाता था। उसे उन सभी सेंध पता थे जिनसे होकर खेतों की इमारतों में घुसा जा सकता था और चूँकि बैसाखियां पकड़ते-पकड़ते उसकी बांहें काफी मजबूत हो गयीं थीं, वह कई बार केवल अपनी कलाइयों की ताकत से ही भूसे की टांड़ पर चढ़ जाता था, जहॉं वह कभी-कभी लगातार चार-पॉंच दिनों तक  पड़ा रहता था, बशर्ते उसके पास इतने दिनों के खाने का जुगाड़ होता। 

वह खेत के जानवरों की तरह जिन्‍दगी गुजारता था। वह इंसानों के बीच रहता था, लेकिन किसी को नहीं जानता था, किसी को प्‍यार नहीं करता था, केवल किसानों के दिलों में एक बेपरवाह हिकारत और द्वेष का कारण बना हुआ था। 


उन्‍होंने उसका नाम 'घण्‍टा' रख छोड़ा था क्‍योंकि वह अपनी दोनों बैसाखियों के बीच उसी तरह लटका रहता था जैसे चर्च का घण्‍टा दोनों खम्‍भों के बीच टंगा रहता है। 




दो दिनों से उसने कुछ नहीं खाया था। अब उसे कोई कुछ नहीं देता था। हर किसी का सब्र जवाब दे चुका था। औरतें जब भी उसे आते देखतीं, दरवाजे पर खड़े होकर उस पर चिल्‍लाने लगतीं। 

''निकलो यहॉं से बेकार आवारा कहीं के। अभी तीन दिन पहले ही तो तुम्‍हें रोटी का टुकड़ा दिया था?'' और वह अपनी बैसाखियों के सहारे अगले घर की ओर बढ़ जाता, वहॉं भी इसी तरह उसका स्‍वागत  होता। 

दरवाजे पर खड़ी औरतें आपस में ही कहतीं, ''इस हरामखोर जंगली को हम पूरे साल भर तो खिलाते नहीं रह सकते।'' 


लेकिन फिर भी उस 'हरामखोर जंगली' को खाने की जरूरत तो पड़ती ही थी। 


वह सेन्‍ट-हिलेयर, वारविले और लेस बिलेट्स में घूम -घूम कर थक चुका था और उसे एक सूखा टुकड़ा तक नसीब नहीं हुआ था। उसकी आखिरी उम्‍मीद थी टूरनोलेस, लेकिन उस जगह तक पहुँचने के लिए सड़क पर पॉंच मील का रास्‍ता तय करना पड़ता, और वह इतना थका हुआ था कि गज भर भी आगे नहीं बढ़ सकता था। उसका पेट और उसकी जेब दोनों एक जैसे ही खाली थे, लेकिन उसने अपने रास्‍ते पर चलना शुरू किया। 


दिसम्‍बर का महीना था और ठण्‍डी हवा खेतों और पेड़ों की नंगी टहनियों से होकर सनसनाती हुई बह रही थी। काले भयावह आसमान के आर-पार बादल तेजी से जा रहे थे। वह लंगड़ा धीरे-धीरे अपने आपको घसीटते हुए चलता र‍हा, तकलीफदेह कोशिश के साथ एक के बाद एक बैसाखियां उठाते हुए, अपनी एक टुण्‍डी टांग का सहारा लेते हुए। 


बीच बीच में वह कुछ पल सुस्‍ताने के लिए खाई के बगल में बैठ जाता। भूख उसके अंग अंग में कुलबुला रही थी, और उसका चकराया हुआ मन्‍द दिमाग एक ही बात सोच रहा था - खाना - लेकिन इसे कैसे पाया जाये यह वह नहीं जानता था। तीन घंटो तक लगातार उसका तकलीफदेह सफर जारी रहा। और आखिर में गांव के पेड़ों की झलक ने उसे नयी ऊर्जा से उत्‍साहित कर दिया था। 


पहला ही किसान, जिससे वह मिला और भीख मांगी, कहने लगा, ''तुम फिर आ गये पुराने बदमाश? क्‍या तुमसे कभी छुटकारा नहीं मिलेगा?'' 


और 'घण्‍टा' अपने रास्‍ते चल दिया। हर दरवाजे पर उसे केवल गालियां मिलती थीं। उसने पूरे गांव का चक्‍कर लगाया, लेकिन इतनी तकलीफ उठाने के बावजूद उसे फूटी कौड़ी तक न मिली। 


फिर वह कीचड़ भर जमीन में दम लगा कर चलता हुआ पड़ोस के खेतों पर गया। हर जगह उसका वैसा ही स्‍वागत हुआ। दिन मे इतनी ठन्डक और रूखापन था जो दिल की धड़कन को जमा देता है और मिजाज को चिड़चिड़ा बना देता है, और पैसे या खाना देने के लिए हाथ तक नहीं खुलते। 


जब वह अपनी जान-पहचान के सारे घरों में घूम चुका, तो शिकेट के खेत के अहाते से होकर गुजरती हुई खाई के किनारे धम्‍म से बैठ गया। अपनी बैसाखियां जमीन पर सरकाकर वह भूख का मारा गतिहीन पड़ा रहा, लेकिन अपनी अकथनीय पीड़ा को पूरी तरह महसूस करने लायक समझ उसमें नहीं थी। 

वह न जाने किस इंतजार में था, दिल में एक धुंधली सी उम्‍मीद लिये, जो मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी हर इंसान के दिल में होती है। दिसम्‍बर की कडकड़ाती सर्दी में वह खेत के अहाते के एक कोने में बैठा हुआ वह किसी दैवीय या इंसानी सहायता का इंतजार कर रहा था, उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि मदद कहॉं से आने वाली थी। काले रंग की कुछ मुर्गियां इधर-उधर भाग रहीं थीं, और उस मिट्टी में अपना भोजन ढूँढ रहीं थीं जो सभी जीवों को पालती है। बीच बीच में वह अपनी चोंच में अनाज का दाना या छोटा कीट झटक लेतीं, फिर वह भोजन के लिए अपनी धीमी, सुनिश्चित खोज में लग जातीं। 

'घण्‍टा' पहले पहले तो बिना कुछ सोचे उन्‍हें देखता रहा। तभी उसके दिमाग की बजाय उसके पेट को एक विचार आया - कि अगर उनमे से एक मुर्गी को लकड़ी की आग पर पका लिया जाये तो इसे खाने में मजा आयेगा। 


उसे यह ख्‍याल भी नहीं आया कि वह चोरी करने जा रहा हे। उसने पास पड़े हुए एक पत्‍थर को उठाया, और निशाने में पक्‍का होने के कारण, एक ही पत्‍थर में उसने सबसे करीब वाली मुर्गी को मार गिराया। मुर्गी अपने पंख फड़फड़ाते हुए एक ओर गिर गई। दूसरी मुर्गियां घबराकर इधर उधर भाग गयीं, और 'घण्‍टा' अपनी बैसाखियां उठाकर उधर बढ़ा जिधर जहां उसका शिकार पड़ा हुआ था। 


जैसे ही वह उस लाल सिर वाली काली चिडि़या के पास पहुँचा, उसकी पीठ पर एक जोरदार प्रहार पड़ा जिससे उसकी बैसाखियां छूट गयीं और वह दस कदम दूर जा गिरा। और किसान शिकेट, जो गुस्‍से में आपे से बाहर हो रहा था, एक लुटने वाले किसान के गुस्‍से के साथ उस पर लात-घूँसे बरसाने लगा। खेत के मजदूर भी आ गये और अपने मालिक के साथ वे भी उस पर थप्‍पड़-घूँसे बरसाने लगे। जब वे उसे पीट-पीट कर थक गये तो ले जाकर उसे लकड़ी के गोदाम में बन्‍द कर दिया, और पुलिस को बुलाने चले गये। 

'घण्‍टा' अधमरा, खून से लथपथ और भूख से बेजान, फर्श पर पडा था। शाम हो गयी -फिर रात- फिर सुबह हो गयी। और अब तक उसने कुछ नहीं खाया था। 


दोपहर के करीब पुलिस आई। उन्‍होंने पूरी सावधानी के साथ गोदाम का दरवाजा खोला, कि कहीं वह भिखारी हाथापाई न करे, क्‍यों कि किसान शिकेट ने बताया था कि उस भिखारी ने उस पर हमला किया था, और बड़ी मुश्किल से वह अपने आपको बचा पाया था।

सार्जेन्‍ट चिल्‍लाया:

''चलो, उठो। ''

लेकिन 'घण्‍टा' हिल भी नहीं सका। उसने अपनी बैसाखियों पर खड़े होने की भरसक कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। पुलिस ने यह सोचकर कि वह कमजोरी होने का नाटक कर रहा है,  उसे बलपूर्वक खींचकर उसे दोनों बैसाखियों के बीच में टांग दिया।

वह डर गया - पुलिस की वर्दी से उसका पैदाइशी डर, खिलाड़ी की मौजूदगी में खेल का डर, एक चूहे का बिल्‍ली के प्रति डर - और फिर एक अतिमानवीय प्रयास के साथ वह सीधे खड़े होने में कामयाब हो गया।

''आगे चलो'', सार्जेन्‍ट ने कहा। वह चल पड़ा। खेत के सारे कामगार उसे जाते हुए देखते रहे। औरतें उस पर घूँसे तान रहीं थीं, आदमी उस पर फब्तियां कस रहे थे। आखिर में वह पकड ही लिया गया। चलो छुटकारा मिला। वह अपने दोनों सहारों पर चलते हुए चला गया। उसने पर्याप्‍त ऊर्जा इकट्ठी कर ली थी - निराशा की ऊर्जा- शाम होने तक चलते रहने के लिए, वह इतना चकराया हुआ था कि उसे मालूम नहीं था उसके साथ क्‍या हो रहा है, वह इतना डरा हुआ था कि कुछ समझ नहीं पा रहा था।

रास्‍ते में जो भी मिलता, रुककर उसे देखने लगता और किसान बुदबुदाने लगते:

''कोई चोर-वोर है।''

शाम के करीब वह टाउन पहुँचा। वह इतनी दूर पहले कभी नहीं निकला था। उसे बिल्‍कुल भी एहसास नहीं था कि वह वहां किसलिये लाया गया था या उसके साथ क्‍या होने वाला था। पिछले दो दिनों की सारी भयानक और अप्रत्‍याशित घटनायें, इन सारे अपरिचित चेहरों और घरों ने उसके दिल में भय पैदा कर दिया था।

वह कुछ नहीं बोला, उसके पास कहने को कुछ नहीं था क्‍यों कि उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। और फिर, वह इतने सालों से किसी से कुछ नहीं बोला था और अपनी जुबान का इस्‍तेमाल करना भी भूल चुका था, और उसके विचार भी इतने अनिश्चित थे कि उन्‍हें शब्‍दों में बयान नहीं किया जा सकता था।

वह टाउन जेल में डाल दिया गया। पुलिस को यह भी नहीं ध्‍यान आया कि उसे खाने की जरूरत हो सकती है, और उसे अगले दिन तक के लिए अकेला छोड़ दिया गया। लेकिन जब अगली सुबह वे उसकी पडताल करने आये, तो वह फर्श पर मृत पाया गया।

केसी आश्‍चर्यजनक चीज थी।

-समाप्‍त-


4 टिप्‍पणियां:

SAJAN.AAWARA ने कहा…

KAHANI ACHI LAGI SIR JI. PADHANE KE LIYE SUKRIYA..
JAI HIND JAI BHARAT

mahendra verma ने कहा…

समाज में भिखारी की दशा का मार्मिक चित्रण।
कहानीकार अपने उद्देश्य में सफल हुए हैं।

Manoj Gupta ने कहा…

अच्छी कहानी। शुक्रिया

Manoj Gupta ने कहा…

अच्छी कहानी। शुक्रिया