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रविवार, 31 जुलाई 2011

बरखा रानी

गूगल इमेज से साभार


गरज उठी घनघोर घटाएं, रिमझिम बारिश आई। 
सोंधी महक उठी मिट्टी की, प्‍यासी धरा जुड़ाई। 
ताल-पोखरे बने समुन्‍दर, नदिया भी बलखाई। 
चमक उठे मोती मक्‍के के, बेर-बेर गदराई। 
बाग-बगीचे, सड़कें, गलियां, बारिश ने धो डालीं। 
कागज की नावें बच्‍चों ने, पानी में तैरा लीं।
पंख पसारे मोर नाचता, देख मोरनी आई।
टर्र-टर्र मेंढक की गूँजें, पड़ने लगीं सुनाई।
इन्‍द्रधनुष छा गया गगन में, लाल, बैंगनी, पीला। 
हरा, आसमानी नारंगी, सुन्‍दर नीला-नीला। 
बरखा रानी नये बरस तुम, इसी तरह फिर आना। 
पशु पक्षी इंसान सभी को, जी भर कर नहलाना।

9 टिप्‍पणियां:

Dr.R.Ramkumar ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति

ZEAL ने कहा…

soft and subtle expression !Beautiful !

mahendra verma ने कहा…

सुंदर वर्षा गीत के लिए बधाई।

veerubhai ने कहा…

घनश्याम मौर्या जी ,इतना सुन्दर "बरखा गीत "यकीन मानिए हम इसे पैन से लिखकर अमरीका भेज रहें हैं अपने धेवते के लिए ,हमारी बिटिया उसे सिखा देगी .बधाई इतना मनभावन ,लोकलुभावन ,गेयऔर सांगीतिक गीत के रचाव के लिए .
Thursday, August 11, 2011
Music soothes anxiety, pain in cancer "पेशेंट्स "

कृपया यहाँ भी हस्तक्षेप करें -
ram ram bhai

बुधवार, १० अगस्त २०११
सरकारी चिंता .

veerubhai ने कहा…

"बरखा गीत "
गरज उठी घनघोर घटाएं ,रिमझिम बारिश आई ,
सौंधी महक उठी मिटटी की ,प्यासी धरा जुडाई.
ताल -पोखरे बने समुन्दर ,नदिया भी बल खाई ,
चमक उठे मोटी मक्के के ,बेर -बेर गदराई .
बाग़ बगीचे ,सड़कें ,गलियाँ ,बारिश ने धौ डाली .
कागज़ की नावें ,बच्चों ने बारिश में तेरा लीं .
पंख पसारे मोर नाचता ,देख मोरनी आई .
टर्र -टर्र मेंढक की गूंजें ,पड़ने लगीं सुनाई .
इंद्र धनुष छा गया गगन में ,लाल ,बैंगनी ,पीला ,
हरा आसमानी नारंगी ,सुन्दर नीला नीला ,
बरखा रानी नए बरस तुम, इसी तरह फिर आना ,
पशु पक्षी इंसान सभी को जी भरके नहलाना .
गुंजन रानी ये कविता ,है छोटी को भिजवाई ,
गा गा कर तुम कह देना "छोटी" को सुनवाई .
"अवि" ताकता न रह जाए उसको भी सिखलाओ ,
बड़े जतन से दोनों मुन्ने अपने पास बिठाओ .
नेहा और स्नेहा से जी साहब और गुंजन रानी को -
पापा ,१५ डी ,/३५२४ /चण्डीगढ़ .

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

mujhe bhi bahut lubhati hai..

रश्मि प्रभा... ने कहा…

waah...

aarkay ने कहा…

उत्तम प्रस्तुति , बरखा ऋतु की सारी खूबियों को समेटे हुए !

अनूप शुक्ल ने कहा…

जाड़े में भी अच्छा लग रहा है वर्षागीत!