मेरी बात:


आयो कहॉं से घनश्‍याम

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

गजल

मैनें जिन्‍दगी अपनी तुम पर ही वारी।
ये दिन भी तुम्‍हारे ये रातें तुम्‍हारी।

जिधर देखती हूँ उधर तुम ही तुम हो,
मोहब्‍बत भी है ये अजब सी बीमारी।

तेरे हर कदम से सफर तय हो मेरा,
नहीं कोई मुश्किल अकेले तुम्‍हारी।

तुम्‍हारी जुदाई मैं यूँ सह रही हूँ,
घडी एक लगती है सदियों से भारी।

जहॉं भी हो तुम लौट आओ सलामत,
दुआ करती हर एक धडकन हमारी।

8 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

लाजबाब गजल है भाई साहब !

dr.mahendrag ने कहा…

tERE HAR KADAM SE SAFAR TYA HO MERA NAHI KOE MUSHKIL AKELE TUMAHARI

BADI UMDA GAZAL

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut Sunder Gazal...

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बहुत खूब

Gyan Darpan
..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-791:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बढ़िया !

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत लाजबाब गजल है|