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आयो कहॉं से घनश्‍याम

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शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

तबीयत शायराना हो रही है



तबीयत शायराना हो रही है।
मोहब्‍बत एक बहाना हो रही है।

जुबॉं को खोलने से डर रहा हूँ,
कलम मेरा फ़साना ढो रही है।

तुझे सुनने की चाहत अब तो ख़ुद ही,
लगा कोयल का गाना हो रही है।

उमड़ती है मेरे अश्‍कों की गंगा,
करम मेरा पुराना धो रही है।

वो बोले शेर अपने मत पढ़ो तुम,
मोहब्‍बत अब निशाना हो रही है।

1 टिप्पणी:

संजय भास्‍कर ने कहा…

ऎसी रचनाएँ रोमांचित कर जाती हैं... एक अलग प्रकार का रोमांच होता है.